नयी दिल्ली, 18 फरवरी (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को पूर्वोत्तर और अन्य क्षेत्रों के नागरिकों के खिलाफ भेदभाव और हिंसा रोकने संबंधी एक जनहित याचिका पर सुनवाई करने से इनकार करते हुए कहा कि नस्ल, क्षेत्र, लिंग और जाति के आधार पर व्यक्तियों की पहचान करना प्रतिगामी मार्ग पर चलने के समान होगा।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची तथा न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने कहा, ‘‘अपराध, अपराध है और इससे सख्ती से निपटा जाना चाहिए।’’ पीठ ने अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी को याचिका पर विचार करने और उसे उचित प्राधिकारी को भेजने का निर्देश दिया।
पीठ ने कहा, ‘‘आजादी के इतने वर्षों बाद नस्ल, क्षेत्र, लिंग और जाति के आधार पर लोगों की पहचान करना प्रतिगामी मार्ग पर चलने के समान होगा।’’
शुरुआत में, याचिकाकर्ता वकील अनूप प्रकाश अवस्थी ने कहा कि यह मुद्दा संसद में उठाया गया था, लेकिन सांसदों ने इस तरह के घृणा अपराधों से निपटने के लिए कोई एजेंसी बनाने से इनकार कर दिया।
त्रिपुरा के 24-वर्षीय एमबीए छात्र अंजेल चकमा की निर्मम हत्या के बाद पिछले साल 28 दिसंबर को जनहित याचिका दायर की गई थी। देहरादून के सेलाक्वी इलाके में 26 दिसंबर, 2025 को नस्लीय रूप से प्रेरित हमले में लगी गंभीर चोटों के कारण चकमा की मौत हो गई थी।
वकील ने कहा कि चकमा को बचाने के लिए कोई आगे नहीं आया। उच्चतम न्यायालय ने जनहित याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया और कहा, ‘‘फिलहाल, हम इस मामले को सक्षम प्राधिकारी के समक्ष लाना उचित समझते हैं।’’
पीठ ने कहा, ‘‘याचिकाकर्ता को याचिका की सॉफ्ट कॉपी, साथ ही इस आदेश की एक प्रति अटॉर्नी जनरल के कार्यालय में जमा करने की स्वतंत्रता के साथ इस रिट याचिका का निपटारा किया जाता है।’’ पीठ ने यह भी कहा कि शीर्ष विधि अधिकारी आवश्यक कार्रवाई करेंगे।
इस जनहित याचिका में पूर्वोत्तर राज्यों और अन्य सीमावर्ती क्षेत्रों के नागरिकों के खिलाफ नस्लीय भेदभाव और हिंसा को रोकने और उससे निपटने में ‘लगातार संवैधानिक विफलता’ को दूर करने के लिए न्यायिक हस्तक्षेप की मांग की गई है।
भाषा शोभना सुरेश
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