जंतर-मंतर प्रदर्शन की निगरानी पर जनहित याचिका अब निरर्थक : केंद्र

जंतर-मंतर प्रदर्शन की निगरानी पर जनहित याचिका अब निरर्थक : केंद्र

जंतर-मंतर प्रदर्शन की निगरानी पर जनहित याचिका अब निरर्थक : केंद्र
Modified Date: July 27, 2026 / 07:58 pm IST
Published Date: July 27, 2026 7:58 pm IST

नयी दिल्ली, 27 जुलाई (भाषा) केंद्र सरकार ने सोमवार को दिल्ली उच्च न्यायालय को बताया कि राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (नीट) प्रश्नपत्र कथित लीक के खिलाफ जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (कॉजपा) के नेतृत्व में प्रदर्शन के दौरान शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों की कथित तौर पर की गई दखलंदाजी वाली निगरानी से जुड़ी जनहित याचिका (पीआईएल) अब निरर्थक हो गई है।

मुख्य न्यायाधीश डी के उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की पीठ ने याचिकाकर्ता से कहा कि वह ‘स्थिति को और सामान्य होने दें’ और बाद में ऐसी याचिका दायर करें जो किसी एक प्रदर्शन तक सीमित ना होकर ‘सामान्य प्रकृति’ की हो।

यह जनहित याचिका जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्र संघ (जेएनयूएसयू) की पूर्व अध्यक्ष आइशी घोष ने दायर की थी।

हालांकि, घोष के वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि याचिका में की गई मांगें अभी भी प्रासंगिक हैं, क्योंकि इसमें कानूनी ढांचे के अभाव में प्रदर्शनकारियों की निगरानी का मुद्दा उठाया गया है।

पीठ ने कहा, ‘बेहतर होगा कि आप ऐसी याचिका दायर करें जिसमें हम प्रावधानों की पड़ताल कर सकें। जैसा कि हमने समझा, यह याचिका एक विशेष प्रदर्शन तक सीमित है। हम आपको एक ऐसी याचिका दायर करने की अनुमति देते हैं जो सामान्य प्रकृति की हो। (वर्तमान याचिका पर जोर देने की) आपकी यह मांग…चीजें शांत हो गई हैं। स्थिति को और सामान्य होने दें।’

पीठ ने पूछा, ‘आप इसे अभी क्यों आगे बढ़ा रहे हैं? बाद की याचिका में आप दिशानिर्देश जारी करने की मांग कर सकते हैं।’

याचिकाकर्ता के वरिष्ठ अधिवक्ता ने दलील दी कि जनहित याचिका में कुछ मांगें अभी भी प्रासंगिक हैं, जैसे प्राधिकारियों को निगरानी के जरिए जुटाए गए सभी व्यक्तिगत डेटा को स्थायी रूप से नष्ट करने का निर्देश देना, खासकर तब जब केंद्र ने आश्वासन दिया है कि प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जाएगी।

अदालत ने कहा कि वह इस मामले पर मंगलवार को सुनवाई करेगी।

इससे पहले याचिकाकर्ता के वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि सार्वजनिक स्थानों पर निजता का अधिकार समाप्त नहीं होता। उन्होंने सादे कपड़ों में पुलिसकर्मियों द्वारा वीडियो रिकॉर्डिंग किए जाने और प्रदर्शनकारियों की पहचान के लिए पुलिस द्वारा कथित रूप से चेहरे की पहचान तकनीक के इस्तेमाल पर चिंता जताई।

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि नीट प्रश्नपत्र लीक के खिलाफ प्रदर्शन की वीडियो रिकॉर्डिंग ‘वैध राज्य हित’ में थी और इस पर आपत्ति जताना विडंबनापूर्ण है।

मेहता ने कहा कि सोशल मीडिया के प्रभावशाली लोग और अन्य लोग भी मौके पर वीडियो बना रहे थे और साक्षात्कार ले रहे थे। उन्होंने कहा कि कॉजपा ने स्वयं प्रदर्शनकारियों से ‘हर चीज की वीडियोग्राफी करने’ को कहा था।

अधिवक्ता सुभाष चंद्रन के आर के माध्यम से दायर जनहित याचिका में अदालत से यह घोषित करने का अनुरोध किया गया है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों की ‘लगातार और दखलंदाजी वाली सामूहिक निगरानी’ संविधान के तहत अनुमेय नहीं है, यह असंगत है और इसे सार्वजनिक व्यवस्था या राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर उचित नहीं ठहराया जा सकता।

याचिका में प्राधिकारियों को जंतर-मंतर पर सामूहिक फोटोग्राफी, वीडियोग्राफी और निगरानी तत्काल रोकने का निर्देश देने का अनुरोध किया गया है, जब तक कि सार्वजनिक व्यवस्था के लिए कोई ‘निकट, वास्तविक और आसन्न खतरा’ न हो, जो ऐसे कदमों को उचित ठहराए।

याचिका में कहा गया है, ‘याचिकाकर्ता के पास ऐसी तस्वीरें हैं, जिनमें स्थायी निगरानी टावर और पुलिसकर्मियों द्वारा लगातार की जा रही फोटोग्राफी एवं वीडियोग्राफी दिखाई देती है, जो प्रतिवादियों द्वारा की जा रही निगरानी की व्यापक और दखलंदाजी वाली प्रकृति को दर्शाती हैं।’

याचिका में कहा गया है कि निगरानी में प्रदर्शन स्थल पर मौजूद हर व्यक्ति को शामिल किया गया है, चाहे उसके खिलाफ किसी गैरकानूनी गतिविधि का कोई संदेह हो या नहीं। याचिका में कहा गया है कि इसमें केवल विरोध प्रदर्शन की गतिविधियां ही नहीं, बल्कि खाना खाने, आराम करने, चिकित्सा सहायता लेने और अन्य निजी गतिविधियों जैसे रोजमर्रा के कार्य भी शामिल हैं।

कॉजपा ने 36 दिन तक चले अपने प्रदर्शन को धर्मेंद्र प्रधान द्वारा केंद्रीय शिक्षा मंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद 25 जुलाई को समाप्त कर दिया था।

भाषा अमित रंजन

रंजन


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