जनहित याचिका: बच्चों के अपहरण की समय-सीमा के भीतर जांच, विशेष अदालतें गठित करने की मांग

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जनहित याचिका: बच्चों के अपहरण की समय-सीमा के भीतर जांच, विशेष अदालतें गठित करने की मांग

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  • Publish Date - September 3, 2026 / 07:28 PM IST,
    Updated On - September 3, 2026 / 07:28 PM IST

नयी दिल्ली, तीन सितंबर (भाषा) बच्चों के अपहरण के मामलों की जांच के लिए पूरे देश में एक समान तंत्र बनाने का अनुरोध करते हुए उच्चतम न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर की गई है।

याचिका में, तय समय-सीमा में जांच, खास जांच प्रक्रियाएं और तेजी से सुनवाई के लिए विशेष अदालतें गठित करने का भी अनुरोध किया गया है।

वकील और याचिकाकर्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय की ओर से दायर इस जनहित याचिका में सभी राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों तथा केंद्रीय शिक्षा, कानून और न्याय और गृह मंत्रालय एवं विधि आयोग को पक्षकार बनाया गया है।

‘एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड’ अश्विनी कुमार दुबे के मार्फत दायर इस याचिका में लापता और अपहृत बच्चों से जुड़े मामलों को संभालने में प्रणालीगत कमियों का जिक्र किया गया है। साथ ही, इसमें जांच एजेंसियों की ओर से तुरंत और तालमेल के साथ कार्रवाई सुनिश्चित करने के लिए न्यायिक हस्तक्षेप का अनुरोध किया गया है।

याचिका में कहा गया है, ‘‘केंद्र और राज्यों को निर्देश दिया जाए कि वे ‘मानक प्रश्न सूची’ और ‘विशेष जांच प्रक्रिया’ तैयार करें। साथ ही, यह सुनिश्चित किया जाए कि अपहरण के मामलों की जांच सहायक पुलिस आयुक्त (एसीपी) या थाना प्रभारी के पद से नीचे के अधिकारी न करें, ताकि जांच तय समय के अंदर पूरी हो सके।’’

इसमें यह भी अनुरोध किया गया कि अपहरण के मामलों का निस्तारण एक साल के भीतर करने के लिए एमपी-एमएलए अदालतों की तरह ही विशेष अदालतें गठित की जाएं।

याचिका में कहा गया है कि केंद्र और राज्यों को निर्देश दिया जाए कि वे अपहरण करने वालों और उनके परिवार के सदस्यों की पूरी संपत्ति का आकलन करें और उसके अनुसार उनके खिलाफ धन शोधन, बेनामी संपत्ति और काला धन से जुड़े कानूनों का इस्तेमाल करें।

साथ ही, केंद्र और राज्य सरकारों को यह निर्देश देने का भी अनुरोध किया गया कि वे अपहरण में शामिल अपराधियों और उनके परिवार के सदस्यों की चल एवं अचल संपत्ति को जब्त करने के लिए कदम उठाएं।

इसमें कहा गया है, ‘‘यह निर्देश दिया जाए और घोषणा की जाए कि अपहरण और अगवा करने के मामलों में क्रमिक सजा दी जाए, न कि एक साथ, ताकि लोगों में डर पैदा हो और अपराध पर अंकुश लगे।’’

जनहित याचिका में कहा गया है कि पुलिस अक्सर तुरंत प्राथमिकी दर्ज नहीं करती है। जांच में देरी होने से अपहृत बच्चों के मिलने की संभावना काफी कम हो जाती है, साथ ही उनकी मानव तस्करी, यौन शोषण, बंधुआ मजदूरी, गैर-कानूनी गोद लेने और अन्य तरह के शोषण का खतरा बढ़ जाता है।

याचिका में उठाया गया एक मुख्य मुद्दा यह है कि लापता बच्चों के बारे में शिकायतों को प्राथमिकी के बजाय सिर्फ ‘‘गुमशुदा’’ या ‘‘लापता व्यक्ति’’ की रिपोर्ट के तौर पर दर्ज किया जाता है।

याचिका के अनुसार, इस तरह के तरीकों से पूरी तरह से आपराधिक जांच शुरू होने में देरी हो सकती है।

भाषा सुभाष रंजन

रंजन