राजस्थान उच्च न्यायालय ने पाली में तेंदुए के पर्यावास की सुरक्षा के लिए व्यापक दिशा निर्देश दिये
राजस्थान उच्च न्यायालय ने पाली में तेंदुए के पर्यावास की सुरक्षा के लिए व्यापक दिशा निर्देश दिये
जोधपुर, छह सितंबर (भाषा) राजस्थान उच्च न्यायालय ने पाली जिले के जवाई में तेंदुए के पर्यावास की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए एक व्यापक नियामकीय ढांचा जारी किया है, जिसमे चिह्नित गुफाओं, मांदों, प्रजनन स्थलों, गलियारे और पर्यावास की अन्य महत्वपूर्ण जगहों के आस-पास एक किलोमीटर के दायरे को नियंत्रित निर्माण क्षेत्र घोषित करना शामिल है।
न्यायमूर्ति पुष्पेंद्र सिंह भाटी और न्यायमूर्ति रेखा बोराना की पीठ ने शनिवार को एक जनहित याचिका पर अपना आदेश सुनाते हुए अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे राज्य सरकार के 31 मार्च, 2015 के आदेश को सख्ती से लागू करें।
इस आदेश के तहत अधिसूचित जवाई तेंदुआ अभयारण्य के एक किलोमीटर के दायरे में होटल और रिसॉर्ट जैसी नयी वाणिज्यिक गतिविधियों के साथ-साथ खनन के लिए भू इस्तेमाल में बदलाव जैसी औद्योगिक गतिविधियों पर रोक लगाई गई है।
पीठ ने फैसले में कहा कि एक किलोमीटर की दूरी एक अंतरिम और सबूतों पर आधारित नियामकीय सीमा के तौर पर काम करेगी, न कि एक स्थायी पारिस्थितिकी सीमा के तौर पर।
अदालत ने राज्य से कहा है कि वह एक ऐसी व्यापक नीति बनाने से पहले भू संदर्भित मानचित्रण और पारिस्थितिकी व देखभाल क्षमता आकलन करें, जिसमें उन इलाकों की पहचान की जाए जिन्हें पूरी सुरक्षा की जरूरत है और जहां नियंत्रित गतिविधियों की अनुमति दी जा सकती है।
अदालत द्वारा जारी निर्देशों के तहत, तेंदुए के चिह्नित पर्यावास पर कोई नया निर्माण, पहाड़ी काटना, पत्थन खनन के लिए विस्फोट, खुदाई, सड़कें या रास्ते बनाना, चारदीवारी या वाणिज्यिक ढांचों के निर्माण की अनुमति नहीं होगी फिर चाहे वह जमीन निजी हो, सरकारी हो, सामुदायिक हो या वन विभाग की। ऐसी गतिविधियों पर भी रोक होगी जो तेंदुओं की आवाजाही या उनके पर्यावास में रुकावट डालें या उन्हें प्रभावित करें।
पीठ ने हालांकि, अपने आदेश में मौजूदा गांव की आबादी वाले इलाकों में प्रमाणित रिहायशी निर्माण, बिना अधिक विस्तार किए वैध मकानों की मरम्मत या पुनर्निर्माण और स्कूल, आंगनवाड़ी, डिस्पेंसरी और पेयजल की सुविधा जैसे आवश्यक सार्वजनिक कार्यों को छूट दी है।
आदेश में पारंपरिक खेती, पशु चराई और पारंपरिक आजीविका गतिविधियों को भी वन्यजीव-अनुकूल शर्तों के अधीन संरक्षित किया गया है।
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि तेंदुए द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली गुफाएं और मांद, प्रजनन और आराम करने की जगहें, आवाजाही के रास्ते, आद्रभूमि, पानी के स्रोत, बस्तियां, सड़कें और पर्यटन केंद्र उसके आदेश के दायरे में होंगे और संबंधित मानचित्र को सार्वजनिक किया जाएगा और उक्त ग्राम पंचायतों में प्रदर्शित किया जाएगा।
अदालत ने साथ ही वन्यजीव पर्यटन के नियमों को भी कड़ा कर दिया है।
पीठ ने कहा कि मौजूदा मानक परिचालन प्रक्रिया (एसओपी)वन, राजस्व, सामुदायिक और निजी जमीनों पर लागू रहेगा।
आदेश में कहा गया कि नाइट सफारी, कृत्रिम रोशनी का इस्तेमाल, ड्रोन का उपयोग, प्रतिबंधित इलाकों में अनधिकृत प्रवेश और तेंदुए के मांदों के पास सफारी गाड़ियों का जमावड़ा करने पर रोक रहेगी।
अदालत ने कहा कि जंगल सफारी के लिए इस्तेमाल वाहनों और उनके संचालकों का पंजीकरण और उक्त वाहनों में जीपीएस प्रणाली होनी आवश्यक होगी। पर्यटन से जुड़े संस्थानों को कमरों या निजी स्थानों से तेंदुए के पक्के तौर पर दिखने का वादा करके विज्ञापन करने पर भी रोक रहेगी।
अदालत ने यह फैसला अपूर्वा अग्रवत की जनहित याचिका पर सुनाया जिसमें तेंदुओं की गुफ़ाओं, मांदों, प्रजनन स्थलों और आवाजाही के गलियारों की सुरक्षा के साथ-साथ निर्माण, पर्यटन और सफारी गतिविधियों को विनियमित करने का अनुरोध किया गया था।
भाषा धीरज नरेश
नरेश

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