राजस्थान: कृत्रिम गर्भाधान तकनीक से जन्मे गोडावण के तीन चूजे
राजस्थान: कृत्रिम गर्भाधान तकनीक से जन्मे गोडावण के तीन चूजे
जयपुर, चार अप्रैल (भाषा) राजस्थान के जैसलमेर जिले में प्रजनन केंद्रों पर कृत्रिम गर्भाधान तकनीक से गोडावण के तीन चूजे पैदा हुए हैं। इससे गोडावण संरक्षण केंद्रों में गोडावण की कुल संख्या बढ़कर 76 हो गई है। अधिकारियों ने यह जानकारी दी।
अधिकारियों के अनुसार इस तकनीक से गोडावण के दो चूजे सुदाश्री प्रजनन केंद्र में पैदा हुए जबकि एक चूजे का जन्म रामदेवरा केंद्र में हुआ। इससे रामदेवरा केंद्र पर गोडावण की संख्या 52 व सुदाश्री केंद्र पर 24 हो गई है।
गोडावण या ग्रेट इंडियन बस्टर्ड (जीआईबी) राजस्थान का ‘राजकीय पक्षी’ घोषित है।
राष्ट्रीय मरू उद्यान के प्रखंड वन अधिकारी (डीएफओ) बृजमोहन गुप्ता ने कहा, ‘गोडावण के संरक्षण में कृत्रिम गर्भाधान बहुत प्रभावी साबित हो रहा है क्योंकि इसे उन परिस्थितियों में भी प्रजनन संभव होता है जहां स्वाभाविक प्रजनन नहीं हो पाता।’
उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय मरू उद्यान क्षेत्र में इस दिशा में वर्षों से किए जा रहे लगातार प्रयास के उत्साहजनक परिणाम अब मिल रहे हैं। उन्होंने कहा, ‘यह तकनीक विलुप्त होने की कगार पर पहुंची पक्षियों की इस प्रजाति के लिए जीवनरेखा बन गई है।’
उल्लेखनीय है कि कभी राजस्थान सहित देश के कई राज्यों में विचरण करने वाला गोडावण यानी ग्रेट इंडियन बस्टर्ड आज सिर्फ राजस्थान के थोड़े से इलाकों में दिखाई देता है। एक समय इसकी संख्या हजारों में थी, लेकिन शिकार, आवासीय इलाके घटने और मानवीय हस्तक्षेप के चलते यह लगभग विलुप्त हो गया था।
बाद में भारत सरकार ने इसे ‘क्रिटिकली एंडेंजर्ड’ घोषित किया और राजस्थान सरकार ने गोडावण संरक्षण को प्राथमिकता दी।
इसी के तहत जैसलमेर के सुदासरी और सम ब्रीडिंग सेंटर में इस प्रजाति के संरक्षण का विशेष अभियान शुरू किया गया जिसके परिणाम अब सामने आ रहे हैं। साल 2018 में केंद्र सरकार वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (देहरादून) और राज्य सरकार ने मिलकर ‘प्रोजेक्ट जीआईबी’ के तहत काम शुरू किया था।
वन विभाग ने इस प्रजाति क संरक्षण की रणनीति के तौर पर नियंत्रित और सुरक्षित वातावरण में ‘कैप्टिव ब्रीडिंग’ को अपनाया है।
अधिकारियों ने बताया कि एक विशेष टीम नवजात चूजों पर निगरानी रख रही है ताकि उन्हें उचित पोषण, स्वास्थ्य देखभाल और व्यवहारिक विकास सुनिश्चित किया जा सके।
उन्होंने आगे कहा कि उन्हें अंततः उनके प्राकृतिक आवासों में छोड़ने के लिए तैयार करने के प्रयास भी किए जा रहे हैं।
भाषा पृथ्वी पवनेश रंजन
रंजन

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