भारत-पाकिस्तान सीमा के पास थार रेगिस्तान में दिखाई दी दुर्लभ प्रजाति की बिल्लियां

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भारत-पाकिस्तान सीमा के पास थार रेगिस्तान में दिखाई दी दुर्लभ प्रजाति की बिल्लियां

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  • Publish Date - May 5, 2026 / 03:44 PM IST,
    Updated On - May 5, 2026 / 03:44 PM IST

जयपुर, पांच मई (भाषा) भारत-पाकिस्तान सीमा के पास थार रेगिस्तान में दुर्लभ कैरेकल प्रजाति की बिल्लियां (स्याहगोश) दिखाई देने से वन्य जीव प्रेमी उत्साहित हैं और इस अत्यंत मायावी व गंभीर रूप से लुप्तप्राय प्रजाति के संरक्षण की नई उम्मीदें जगी हैं। अधिकारियों ने मंगलवार को यह जानकारी दी।

अधिकारियों ने कैमरा ट्रैप और रेडियो-कॉलरिंग की मदद से राजस्थान के जैसलमेर के शाहगढ़ इलाके में दो दुर्लभ कैरकेल देखी हैं जिनमें से एक नर और एक मादा है। इससे इस प्रजाति की कुल दर्ज संख्या बढ़कर तीन हो गई है।

उल्लेखनीय है कि यह कैरेकल कैट मध्यम आकार की जंगली बिल्ली होती है। इसकी एक विशेषता लंबे काले बालों वाले कान हैं। इसी कारण इसे ‘स्याहगोश’ भी कहा जाता है।

स्थानीय रूप से ‘पदंग’ के नाम से जानी जाने वाली कैरैकल वन्यजीव संरक्षण अधिनियम की अनुसूची एक के तहत संरक्षित है। कभी राजस्थान और गुजरात में बड़ी संख्या में पाई जाने वाली इस बिल्ली जैसी प्रजाति की आबादी में 95% से अधिक की गिरावट आई है। इसकी वजह हसके आवासीय क्षेत्र में कमी, बदले की भावना से की जाने वाली हत्याएं हैं।

भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआईआई) के सर्वेक्षणों के अनुसार भारत में अब केवल लगभग 50 कैरैकल ही बचे हैं।

संस्थान ने कहा है कि वह इस प्रजाति के व्यवहार, आवागमन के तरीकों और पारिस्थितिकी पर एक विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन कर रहा है, जबकि भारतीय वन्यजीव ट्रस्ट ने संरक्षण प्रयासों में स्थानीय समुदायों को शामिल करने और मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने के लिए एक पायलट परियोजना शुरू किया है।

वन अधिकारियों ने बताया कि चुनिंदा स्थानों पर लगाए गए मोशन-सेंसिंग कैमरा ट्रैप से, उनकी सीमित संख्या के बावजूद, उत्साहजनक परिणाम मिले हैं। अधिकारियों ने बताया कि एक और कैरैकल को भी रेडियो कॉलर लगाया गया है ताकि उसके आवागमन, आवास के उपयोग और मानव बस्तियों से उसकी निकटता पर नज़र रखी जा सके।

उप वन संरक्षक कुमार शुभम ने कहा, ‘कैमरा ट्रैप और रेडियो-कॉलरिंग के माध्यम से लगातार निगरानी करने से हमें इस प्रजाति के व्यवहार और आवास के उपयोग को बेहतर ढंग से समझने में मदद मिल रही है।’

इन निष्कर्षों के बाद, इस प्रजाति के व्यापक आवास क्षेत्र का आकलन करने के लिए घोटारू और थार रेगिस्तान के अन्य हिस्सों में अतिरिक्त कैमरा ट्रैप लगाए गए हैं।

अधिकारियों ने बताया कि अध्ययन पूरा होने के बाद एक व्यापक संरक्षण योजना तैयार की जाएगी।

भाषा पृथ्वी रंजन

रंजन