तृणमूल के बागी सांसदों ने सदस्यता समाप्त करने की याचिका पर नोटिस का जवाब देने के लिए मांगा समय

तृणमूल के बागी सांसदों ने सदस्यता समाप्त करने की याचिका पर नोटिस का जवाब देने के लिए मांगा समय

तृणमूल के बागी सांसदों ने सदस्यता समाप्त करने की याचिका पर नोटिस का जवाब देने के लिए मांगा समय
Modified Date: September 1, 2026 / 08:20 pm IST
Published Date: September 1, 2026 8:20 pm IST

कोलकाता, एक सितंबर (भाषा) तृणमूल कांग्रेस छोड़कर नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) के साथ जुड़ने वाले 20 लोकसभा सदस्यों ने उस याचिका पर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के नोटिस का जवाब देने के लिए तीन सप्ताह का समय मांगा है जिसमें दल-बदल रोधी कानून के तहत उनकी सदस्यता समाप्त करने का अनुरोध किया गया है। वरिष्ठ नेता सुदीप बंदोपाध्याय ने मंगलवार को यह जानकारी दी।

सूत्रों ने बताया कि लोकसभा सचिवालय ने 26 अगस्त को तृणमूल कांग्रेस के 20 बागी सांसदों को नोटिस जारी कर पार्टी नेता अभिषेक बनर्जी की ओर से उनकी सदस्यता खत्म करने की मांग को लेकर दायर याचिकाओं पर सात दिन के भीतर जवाब मांगा है।

गत 25 अगस्त के नोटिस के साथ बनर्जी की 18 जून की याचिका की प्रति भी सांसदों को भेजी गई थी।

लोकसभा में एनसीपीआई के नेता बंदोपाध्याय ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ‘‘हमें 26 अगस्त को लोकसभा सचिवालय से पत्र मिला, जिसमें अभिषेक बनर्जी के उस पत्र के संबंध में जवाब मांगा गया है, जिसमें एनसीपीआई के 20 सांसदों की सदस्यता खत्म करने का अनुरोध लोकसभा अध्यक्ष से किया गया है। हमने लोकसभा सचिवालय को पत्र लिखकर जवाब देने के लिए तीन सप्ताह का समय मांगा है।’’

एनसीपीआई के एक अन्य सांसद ने बताया कि बागी सांसद अपना जवाब अंतिम रूप देने से पहले वकीलों से सलाह ले रहे हैं। इससे संकेत मिलता है कि यह समूह शुरुआती सात दिन की समयसीमा में जल्दबाजी में जवाब देने के बजाय विस्तृत कानूनी बचाव तैयार कर रहा है।

अतिरिक्त समय की मांग ऐसे समय की गई है जब सदस्यता समाप्त करने की यह लड़ाई तृणमूल नेतृत्व और बागी गुट के बीच व्यापक संगठनात्मक और विधायी टकराव के साथ आगे बढ़ रही है।

उच्चतम न्यायालय द्वारा 25 अगस्त को टीएमसी नेता अभिषेक बनर्जी की उस याचिका पर सुनवाई के लिए सहमति जताए जाने के बाद ये नोटिस जारी किए गए थे, जिसमें लोकसभा अध्यक्ष से बागी सांसदों की सदस्यता खत्म करने की याचिकाओं पर जल्द फैसला लेने का अनुरोध किया गया था।

प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने बनर्जी की याचिका पर 20 सांसदों को नोटिस जारी किया था और सदस्यता खत्म करने की लोकसभा अध्यक्ष के समक्ष जारी कार्यवाही पर जल्द निर्णय लेने का निर्देश दिया था।

बनर्जी ने जून में लोकसभा अध्यक्ष के समक्ष अलग-अलग याचिकाएं दाखिल करने के बाद उच्चतम न्यायालय का रुख किया था। इन याचिकाओं में तृणमूल छोड़कर एनसीपीआई के साथ जुड़ने वाले सांसदों की सदस्यता दल-बदल रोधी कानून के तहत समाप्त करने की मांग की गई थी। इसके बाद अध्यक्ष की ओर से जारी नोटिस में सांसदों से सात दिन के भीतर जवाब मांगा गया था।

तृणमूल के एक बागी सांसद ने कहा कि अतिरिक्त समय मांगने से बागी गुट को कानूनी और राजनीतिक पहलुओं पर विचार करने के लिए कुछ राहत मिलेगी।

समझा जाता है कि सांसद इस पर भी कानूनी राय ले रहे हैं कि दल-बदल रोधी कानून के प्रावधान उनके मामले में किस तरह लागू होते हैं और अध्यक्ष के समक्ष क्या दलीलें रखी जा सकती हैं।

बीस लोकसभा सीट को लेकर यह विवाद पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के भीतर जारी व्यापक संकट का नया केंद्र बन गया है। मई में विधानसभा चुनाव में पार्टी की हार के बाद यह संकट अब सीधे संस्थागत और राजनीतिक टकराव में बदल गया है।

बागी गुट पहले ही पार्टी के निर्वाचित प्रतिनिधियों के बीच अपने पर्याप्त समर्थन का दावा कर चुका है। पश्चिम बंगाल विधानसभा में तृणमूल के 80 विधायकों में से 65 ने विपक्ष के नेता पद के लिए ऋतब्रत बनर्जी के दावे का समर्थन किया था और ममता बनर्जी खेमे द्वारा समर्थित उम्मीदवार को खारिज कर दिया था।

इसके बाद बागी विधायकों ने विशेष सत्र बुलाया, वरिष्ठ विधायक अरूप राय को अध्यक्ष चुना और समानांतर राष्ट्रीय नेतृत्व ढांचे की घोषणा की। उनका दावा था कि मौजूदा नेतृत्व ने निर्वाचित प्रतिनिधियों के बहुमत का विश्वास खो दिया है।

इसके बाद यह टकराव संसद तक पहुंचा, जहां तृणमूल के 20 लोकसभा सदस्य नवगठित एनसीपीआई के साथ हो गए और भाजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) में शामिल हो गए।

तृणमूल नेतृत्व ने इन सांसदों के दल बदलने को भाजपा की ओर एक सुनियोजित राजनीतिक बदलाव के सबूत के तौर पर पेश किया है। हालांकि, बागी गुट का कहना है कि उसके राजनीतिक और संगठनात्मक फैसले मौजूदा तृणमूल नेतृत्व पर विश्वास खत्म होने के कारण लिए गए हैं।

इसलिए इन सांसदों की सदस्यता खत्म करने की कार्यवाही का महत्व केवल व्यक्तिगत सांसदों के भविष्य तक सीमित नहीं है। दोनों खेमे इस बात पर नजर रखे हुए हैं कि लोकसभा अध्यक्ष का फैसला पश्चिम बंगाल में राजनीतिक ताकतों के संतुलन को किस तरह प्रभावित कर सकता है।

भाषा अमित अविनाश

अविनाश


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