जात-पात से ऊपर उठें, संपन्न एवं विपन्न के बीच की खाई को पाटने पर ध्यान दें: मुर्मू

जात-पात से ऊपर उठें, संपन्न एवं विपन्न के बीच की खाई को पाटने पर ध्यान दें: मुर्मू

जात-पात से ऊपर उठें, संपन्न एवं विपन्न के बीच की खाई को पाटने पर ध्यान दें: मुर्मू
Modified Date: April 14, 2026 / 05:12 pm IST
Published Date: April 14, 2026 5:12 pm IST

(फोटो के साथ)

अहमदाबाद, 14 अप्रैल (भाषा) राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने मंगलवार को लोगों से जातिगत विभाजन से ऊपर उठकर एक समावेशी समाज की दिशा में काम करने की अपील करते हुए कहा कि देश को अब ‘संपन्न और विपन्न’ के बीच की खाई को पाटने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।

मुर्मू ने गांधीनगर के लोक भवन (राज्यपाल आवास) में डॉ. बी. आर. आंबेडकर की जयंती पर आयोजित ‘सामाजिक समरसता महोत्सव’ को संबोधित करते हुए कहा कि जाति प्रथा अतीत की बात है और लोगों को अब एक समाज के रूप में आगे बढ़ना चाहिए।

उन्होंने पिछड़े हुए लोगों के उत्थान की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा, “जाति प्रथा बनाने वाले अब नहीं रहे। हमें मिलकर आगे बढ़ना होगा और सामाजिक सद्भाव को मजबूत करना होगा। एक तरह से अब केवल दो ही जातियां हैं – संपन्न और वंचित (विपन्न)।”

एकता का आह्वान करते हुए उन्होंने कहा, ‘‘ किसी को भी केवल अपने ही हित की बात नहीं करनी चाहिए। हम सभी एक हैं। हम भाई-बहन हैं।’’

भारत की सांस्कृतिक एकता पर जोर देते हुए राष्ट्रपति ने कहा कि देश की परंपराएं करुणा, समानता, पारस्परिक कल्याण और सद्भाव पर आधारित हैं।

उन्होंने कहा, ‘‘सभी विभाजनों से ऊपर उठकर बिना किसी भेदभाव के एकजुट रहना ही सामाजिक सद्भाव की सच्ची अभिव्यक्ति है।’’

एकता का आह्वान करते हुए उन्होंने कहा कि भारत माता की सभी संतानें एक हैं, जाति, वर्ग, भाषा या क्षेत्र के आधार पर नागरिकों में कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए।

मुर्मू ने इस बात पर भी जोर दिया कि भारत के विकास और सामाजिक ताने-बाने में गांवों का विशेष महत्व है।

उन्होंने कहा,“देश की आत्मा उसके गांवों में बसती है। एक सद्भावपूर्ण समाज के निर्माण का मार्ग गांवों से होकर गुजरता है। विविधता के बावजूद, गांवों के लोगों में स्नेह, आत्मीयता और आपसी समझ होती है। यही भारतीय संस्कृति की सच्ची भावना को दर्शाता है।”

उन्होंने कहा कि यदि गांव समृद्ध होंगे, तो देश समृद्ध होगा।

बी आर अंबेडकर का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि उनका सद्भाव का संदेश स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व पर आधारित था।

आंबेडकर के ‘स्वयं को शिक्षित करें’ के संदेश को याद करते हुए राष्ट्रपति ने कहा कि शिक्षा व्यक्तिगत और राष्ट्रीय विकास दोनों की नींव है।

उन्होंने कहा,‘‘शिक्षा के मूल में राष्ट्र और समाज का विकास निहित है। हमारे संविधान ने शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाया है। यह हमारा दायित्व है कि हम यह सुनिश्चित करें कि गांवों या शहरों में रहने वाले हाशिए पर पड़े वर्गों के लोगों को शिक्षा प्राप्त हो।’’

उन्होंने कहा, ‘‘सफल होना अच्छी बात है, लेकिन इसका असली अर्थ तभी समझ आता है जब आप पीछे मुड़कर देखते हैं कि आप कितने लोगों की मदद कर सकते हैं। आप पूरे देश को तो नहीं बदल सकते, लेकिन आपको खुद से यह सवाल जरूर पूछना चाहिए कि आप दूसरों के लिए क्या कर सकते हैं।’’

भाषा राजकुमार नरेश

नरेश


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