( अंकुर सेठी )
जम्मू, 25 जून (भाषा) बाबा अमरनाथ के प्रति गहरी आस्था के चलते नेपाल से बड़ी संख्या में साधु-संत वार्षिक अमरनाथ यात्रा में शामिल होने के लिए जम्मू पहुंचने लगे हैं। इनमें से कई साधु वर्षों से लगातार इस यात्रा में शामिल होते आ रहे हैं और इसे अपनी धार्मिक परंपरा का अभिन्न हिस्सा मानते हैं।
तीन जुलाई से शुरू होने वाली 57 दिवसीय अमरनाथ यात्रा से पहले जम्मू शहर के ऐतिहासिक राम मंदिर में साधु-संतों का जमावड़ा लगना शुरू हो गया है। दक्षिण कश्मीर के अनंतनाग जिले में समुद्र तल से 3,880 मीटर की ऊंचाई पर स्थित पवित्र गुफा तक जाने वाले साधुओं के लिए यह मंदिर प्रमुख पड़ाव और ठहरने का केंद्र है।
नेपाल से आए साधु छोटा डोमी दास ने बताया कि वह पिछले नौ वर्षों से नियमित रूप से अमरनाथ यात्रा कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि हर वर्ष साधु-संत बड़े उत्साह के साथ यात्रा में शामिल होते हैं और भगवान भोलेनाथ का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।
नेपाल के ही एक अन्य साधु विष्णु देव ने कहा कि वह कई बार अमरनाथ यात्रा कर चुके हैं और इस बार भी यात्रा को लेकर काफी उत्साहित हैं। उन्होंने उम्मीद जताई कि इस वर्ष भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु यात्रा में शामिल होंगे।
पहली बार अमरनाथ यात्रा पर आए बिचारे दास ने कहा कि बाबा अमरनाथ के दर्शन करना उनका लंबे समय से सपना था। उन्होंने जम्मू-कश्मीर को सुंदर और अपनापन महसूस कराने वाला स्थान बताया तथा शांति और सभी लोगों के कल्याण की कामना की।
नेपाल के जनकपुर निवासी देव नारायण चौधरी ने कहा कि उनके गांव में अमरनाथ यात्रा को लेकर काफी उत्साह है और बड़ी संख्या में साधु तथा श्रद्धालु यात्रा के लिए रवाना हुए हैं। उन्होंने कहा कि उन्हें पूर्ण विश्वास है कि बाबा अमरनाथ सभी श्रद्धालुओं की रक्षा करेंगे।
कठिन पर्वतीय मार्ग और शारीरिक चुनौतियों के बावजूद श्रद्धालुओं का उत्साह कम नहीं हुआ है। नेपाल से आए निकिल दास ने कहा कि बचपन से उन्होंने सुना है कि बाबा अमरनाथ के दर्शन से आध्यात्मिक शांति मिलती है और जीवन की कठिनाइयां दूर होती हैं।
एक अन्य साधु जमना दास ने बताया कि उन्हें जम्मू पहुंचने में 10 दिन लगे। उन्होंने यात्रा के लिए परिवहन सुविधा उपलब्ध कराने पर भारत सरकार का आभार व्यक्त किया।
अमरनाथ यात्रा के लिए श्रद्धालुओं का पहला जत्था दो जुलाई को जम्मू से रवाना होगा। यात्रा तीन जुलाई से अनंतनाग जिले के पारंपरिक 48 किलोमीटर लंबे पहलगाम मार्ग और गांदरबल जिले के 14 किलोमीटर लंबे बालटाल मार्ग से शुरू होगी।
नेपाल से आने वाले साधु-संतों की मौजूदगी भारत और नेपाल के बीच गहरे आध्यात्मिक तथा सांस्कृतिक संबंधों को भी रेखांकित करती है, जो राजनीतिक सीमाओं से परे आज भी मजबूत बने हुए हैं।
भाषा मनीषा वैभव
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