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अहमदाबाद, पांच मार्च (भाषा) राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने बृहस्पतिवार को कहा कि सनातन धर्म सामाजिक सद्भाव और एकता को बढ़ावा देता है। उन्होंने साथ ही कहा कि जाति के नाम पर भेदभाव किया जाना धर्म और समाज दोनों को नुकसान पहुंचाता है।
भागवत ने यहां के निकट जेतलपुर गांव में स्वामीनारायण मंदिर में एक समारोह को संबोधित करते हुए कहा कि भगवान की प्रत्येक रचना का एक उद्देश्य होता है और सभी के प्रति अपनेपन की भावना सामाजिक सद्भाव का सार है।
उन्होंने कहा, “ईश्वर की सृष्टि में सूखी घास के तिनके का भी कोई न कोई उद्देश्य होता है। सभी को इसी भाव से अपनाना और हृदय में अपनेपन की भावना रखना ही सामाजिक समरसता कहलाता है। हर व्यक्ति ईश्वर की रचना है।’’
भागवत ने कहा, ‘‘ऊंच-नीच का भेद आखिर कहां से आया? जाति और वर्ग व्यवस्थाएं शायद मौजूद थीं, लेकिन इनका उद्देश्य भेदभाव करना नहीं था। जब इस तरह की व्यवस्था में भेदभाव प्रवेश कर जाता है, तो यह धर्म और समाज दोनों को नुकसान पहुंचाता है।’’
उन्होंने कहा कि धर्म केवल शास्त्रों, भाषणों या कल्पना तक सीमित नहीं है, बल्कि व्यवहार और आचरण में भी विद्यमान होता है।
भागवत ने कहा, ‘‘जब हम सनातन धर्म का पालन करते हैं, तो धर्म की रक्षा स्वतः ही हो जाती है। धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिए लोगों में एकता आवश्यक है। यदि आप धर्म और संस्कृति की रक्षा करना चाहते हैं, तो उनका पालन करने वालों की रक्षा करें।’’
उन्होंने कहा कि एकता से ही सुरक्षा मिलती है और ताकत भी इसी से उत्पन्न होती है। उन्होंने कहा कि लोगों को एकजुट करने के लिए मन में अपनेपन और पूर्णता की भावना होनी चाहिए और ऐसा दृष्टिकोण ही वर्तमान समय में सामने आने वाली चुनौतियों का समाधान है।
भागवत ने कहा, ‘‘भारत को अंतत: दुनिया की समस्याओं के समाधान में मार्गदर्शन करना होगा। एक दिन भारत को ही पूरी दुनिया को राह दिखाने का दायित्व सौंपा जायेगा। हम इससे बच नहीं सकते; हमें यह काम आज नहीं तो कल करना ही होगा। दुनिया के पास अपनी समस्याओं के समाधान नहीं हैं। इस जिम्मेदारी के लिए हमें तैयार रहना होगा।’’
उन्होंने कहा, ‘‘धर्म लोगों को एकजुट करता है, इसलिए हमें एकजुट करने वाला बनना चाहिए, न कि विभाजन करने वाला। हमें सभी को एकजुट करना होगा।’’
भागवत ने कहा, ‘‘धर्म शाश्वत और चिरस्थायी है। न तो हमने और न ही किसी और ने इसे बनाया है। ईश्वर की इच्छा से इस सृष्टि की रचना हुई और उसके साथ जो नियम आए, वही धर्म हैं।’’
उन्होंने ‘‘धर्मो रक्षति रक्षितः’’ वाक्यांश का हवाला देते हुए कहा कि जो लोग धर्म की रक्षा करते हैं, धर्म उनकी रक्षा करता है।
उन्होंने मन, बुद्धि और कर्मों में सामंजस्य स्थापित करने के महत्व पर भी जोर दिया और कहा कि व्यक्तियों को आत्म-अनुशासन से शुरुआत करनी चाहिए।
संघ प्रमुख ने कहा, ‘‘धर्म और मूल्यों की रक्षा शब्दों से नहीं, बल्कि आचरण से होती है। ऐसा केवल सपने देखने या बातें करने से नहीं, बल्कि कर्म करने से हासिल होता है।’’
भाषा
देवेंद्र रंजन
रंजन