न्यायालय ने जम्मू-कश्मीर प्रशासन से 1953 में थाने के लिए जबरन ली गई जमीन का मुआवजा देने को कहा

न्यायालय ने जम्मू-कश्मीर प्रशासन से 1953 में थाने के लिए जबरन ली गई जमीन का मुआवजा देने को कहा

न्यायालय ने जम्मू-कश्मीर प्रशासन से 1953 में थाने के लिए जबरन ली गई जमीन का मुआवजा देने को कहा
Modified Date: August 17, 2026 / 08:28 pm IST
Published Date: August 17, 2026 8:28 pm IST

नयी दिल्ली, 17 अगस्त (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को जम्मू-कश्मीर प्रशासन से उन किसानों के वंशज को मुआवजा और किराया देने को कहा, जिनकी जमीन 73 साल से भी अधिक पहले गांदरबल के कंगन में बिना किसी अधिग्रहण प्रक्रिया के पुलिस थाना बनाने के लिए जबरदस्ती ले ली गई थी।

कंगन में सात कनाल और 18 मरला जमीन 1953 में पुलिस थाना बनाने के लिए बिना अधिग्रहण और बिना मुआवजा दिए जबरदस्ती ले ली गई थी।

प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची तथा न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने अब्दुल रशीद वानी की याचिका का संज्ञान लिया। वानी ने वकील महफूज अहसान नाजकी के जरिये उच्चतम न्यायालय में जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख उच्च न्यायालय के 2022 के फैसले को चुनौती दी थी।

उच्च न्यायालय ने 1953 में गांदरबल जिले में पुलिस थाने के लिए ली गई जमीन पर कब्जे की मांग वाली रिट याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि इस दावे में 68 साल की बहुत ज्यादा और बिना वजह देरी हुई है।

उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को वानी की जोरदार दलीलों पर विचार किया कि भले ही देरी हुई हो, लेकिन उन्हें राज्य की गैर-कानूनी कार्रवाई की वजह से नुकसान नहीं उठाना चाहिए।

शीर्ष अदालत ने कहा कि लगभग सात दशकों की देरी के कारण वह अभी जमीन अधिग्रहण की नई प्रक्रिया शुरू करने का आदेश नहीं दे सकती।

हालांकि, पीठ ने कहा कि वह भू-अधिग्रहण अधिकारी को उस तारीख से अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू करने का आदेश देगी जब वानी ने 2021 में उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था।

वानी के बचाव में पीठ ने अधिग्रहण अधिकारी को आदेश दिया कि 1953 में जब पुलिस थाना बनाने के लिए जमीन जबरदस्ती ली गई थी तब से वह (अधिकारी) वानी के लिए किराये का हिसाब लगाएं और उसका भुगतान करें।

पीठ ने कहा कि जमीन अधिग्रहण और किराये की रकम का अंतिम फैसला उच्च न्यायालय करेगा।

भाषा वैभव सुरेश

सुरेश


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