न्यायालय ने आयुष चिकित्सकों को पंजीकृत चिकित्सा पेशेवर घोषित करने संबंधी याचिका पर जवाब मांगा

न्यायालय ने आयुष चिकित्सकों को पंजीकृत चिकित्सा पेशेवर घोषित करने संबंधी याचिका पर जवाब मांगा

न्यायालय ने आयुष चिकित्सकों को पंजीकृत चिकित्सा पेशेवर घोषित करने संबंधी याचिका पर जवाब मांगा
Modified Date: January 12, 2026 / 01:55 pm IST
Published Date: January 12, 2026 1:55 pm IST

नयी दिल्ली, 12 जनवरी (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को उस याचिका पर केंद्रीय कानून, स्वास्थ्य और आयुष मंत्रालयों से जवाब मांगा, जिसमें आयुष चिकित्सकों को एलोपैथिक चिकित्सकों की तरह कानून के तहत ‘पंजीकृत चिकित्सा पेशेवर’ घोषित करने का निर्देश देने का अनुरोध किया गया है।

जनहित याचिका में 1954 के उस कानून की समीक्षा और उसे अद्यतन करने के लिए एक विशेषज्ञ समिति गठित करने का निर्देश देने का भी अनुरोध किया गया है जिसका उद्देश्य वर्तमान वैज्ञानिक घटनाक्रम के अनुसार कुछ मामलों में दवाओं के विज्ञापन को नियंत्रित करना है।

भारत के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने याचिकाकर्ता विधि छात्र नितिन उपाध्याय की ओर से पेश हुए अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय की दलीलों पर संज्ञान लिया और जनहित याचिका (पीआईएल) पर नोटिस जारी किया। याचिकाकर्ता अश्विनी उपाध्याय का पुत्र है।

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सीजेआई ने अश्विनी उपाध्याय से पूछा, ‘‘क्या यह आपके बेटे हैं?’’

वकील ने जवाब दिया, ‘‘हां।’’

पीठ ने कहा, ‘‘हमने तो सोचा था कि वह कोई स्वर्ण पदक वगैरह लाएंगे, लेकिन वह तो अब जनहित याचिका दायर कर रहे हैं। अभी पढ़ाई क्यों नहीं करते? … नोटिस जारी कीजिए। केवल आपके बेटे के लिए। ताकि वह अच्छी तरह पढ़ाई कर सके।’’

याचिका में यह निर्देश देने का अनुरोध किया गया है कि आयुष चिकित्सकों को भी औषधि एवं चमत्कारी उपचार (आपत्तिजनक विज्ञापन) अधिनियम, 1954 की धारा 2(सीसी) के तहत ‘पंजीकृत चिकित्सा पेशेवर’ की श्रेणी में शामिल किया जाए।

यह अधिनियम कुछ मामलों में दवाओं के विज्ञापनों को नियंत्रित करने तथा चमत्कारी गुणों वाले बताए जाने वाले उपचारों के विज्ञापन पर रोक लगाने के उद्देश्य से बनाया गया था। अधिनियम की धारा 2(सीसी) में ‘पंजीकृत चिकित्सा पेशेवर’ की परिभाषा दी गई है।

याचिका में कहा गया है कि यह अधिनियम जनता को झूठे और भ्रामक चिकित्सीय विज्ञापनों से बचाने के लिए बनाया गया था, लेकिन इसकी धारा 3(डी) कुछ बीमारियों और स्थितियों से संबंधित विज्ञापनों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाती है।

अधिनियम की धारा 3 कुछ बीमारियों और विकारों के उपचार से संबंधित दवाओं के विज्ञापन पर रोक से संबंधित है।

याचिका में कहा गया है कि चूंकि आयुष चिकित्सक और अन्य वास्तविक गैर-एलोपैथिक पंजीकृत चिकित्सा पेशेवर अधिनियम की धारा 14 में दिए गए अपवाद के दायरे में नहीं आते, इसलिए यह ‘सर्वसमावेशी प्रतिबंध’ उन्हें गंभीर बीमारियों के लिए उपलब्ध दवाओं के अस्तित्व के विज्ञापन से प्रभावी रूप से रोक देता है, जिससे जनता में दवाओं के बारे में व्यापक अज्ञानता फैलती है।

अधिवक्ता अश्वनी कुमार दुबे के माध्यम से दाखिल याचिका में कहा गया है कि जानलेवा और दीर्घकालिक बीमारियों के निदान, रोकथाम, नियंत्रण, इलाज और उपचार के बारे में जानकारी पाने का अधिकार एक ‘‘पुरातन कानून’’ के तहत लगाए गए अत्यधिक और असंगत विज्ञापन प्रतिबंध के कारण समाप्त कर दिया गया है।

भाषा गोला मनीषा

मनीषा


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