नयी दिल्ली, 28 जुलाई (भाषा) दिल्ली उच्च न्यायालय ने छात्रों के शिक्षा के अधिकार और राष्ट्रीय राजधानी में जारी मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के काम के बीच संतुलन बनाने की जरूरत पर जोर दिया। इसने निर्वाचन आयोग से कहा कि वह इस प्रक्रिया के लिए लगाए गए सरकारी विद्यालयों के शिक्षकों की स्थिति के प्रति ‘‘संवेदनशील’’ रहे और यह सुनिश्चित करे कि उन पर काम का अत्यधिक बोझ न डाला जाए।
दिल्ली उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश डी. के. उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस करिया की पीठ ने मंगलवार को कहा कि मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) निस्संदेह ‘‘महत्वपूर्ण’’ है, लेकिन इसने चुनाव संबंधी काम में बाधा न डालने को लेकर प्रधानाचार्यों को दिए गए निर्वाचन आयोग के आदेश की ‘‘धमकी भरी भाषा’’ पर अप्रसन्न्ता जताई।
पीठ ने प्राधिकारियों को यह भी निर्देश दिया कि वे इस बात का ध्यान रखें कि लंबे समय तक स्कूल में काम करने के बाद बूथ स्तरीय अधिकारी (बीएलओ) और गणना कर्मियों के रूप में लगाए गए शिक्षकों पर अनावश्यक दबाव न पड़े।
इसने निर्वाचन आयोग से कहा, ‘‘हम आपसे केवल इतना चाहते हैं कि आप उनकी स्थिति के प्रति थोड़ा संवेदनशील रहें। हम आपके अधिकार को कम नहीं कर रहे हैं। हम उन मानवीय परिस्थितियों को समझ रहे हैं, जिनसे ये शिक्षक गुजर रहे हैं। किसी भी शिक्षक से 11 घंटे काम करने की अपेक्षा करना… ज्यादातर शिक्षक महिलाएं हैं। उनके बच्चे और परिवार हैं। आपको उनकी परिस्थितियों को मानवीय दृष्टिकोण से देखना होगा। आदेश जारी करते समय आपने किस तरह की भाषा का इस्तेमाल किया है? क्या आप भय पैदा करना चाहते हैं?’’
पीठ ने कहा, ‘‘हम निर्वाचन आयोग द्वारा किए जा रहे कार्य को कमतर नहीं आंक रहे हैं। मुद्दा यह है कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम की धारा 27 के साथ संतुलन कैसे बनाया जाए। ऐसा लगता है कि आपको शिक्षा के अधिकार अधिनियम की कम परवाह है। आपने जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल किया है, वह पत्र की पूरी भावना को धमकी भरा बनाती है।’’
याचिकाकर्ता की ओर से यह आरोप लगाए जाने पर कि शिक्षकों को अपने स्कूल के दायित्व नहीं निभाने दिए जा रहे हैं, अदालत ने उन्हें निर्वाचन आयोग के जवाब पर प्रत्युत्तर दाखिल करने और ऐसा कोई विशिष्ट उदाहरण बताने को कहा, जिसमें किसी शिक्षक को पढ़ाने के बजाय चुनाव संबंधी काम को प्राथमिकता देने के लिए कहा गया हो।
निर्वाचन आयोग के वकील ने अदालत से कहा कि सरकारी शिक्षकों पर जरूरत से ज्यादा भार नहीं डाला जा रहा है। उन्होंने कहा कि उनकी सहायता के लिए स्वयंसेवक उपलब्ध हैं और उन्हें जलपान भी उपलब्ध कराया जा रहा है।
उन्होंने बताया कि एसआईआर प्रक्रिया केवल आठ अगस्त तक निर्धारित है, और ‘‘नियमित’’ विषयों की पढ़ाई भी प्रभावित नहीं हुई है, क्योंकि उच्चतम न्यायालय के निर्देशों के अनुसार शिक्षकों को छुट्टियों, गैर-शिक्षण दिनों या गैर-शिक्षण समय में काम करने को कहा गया है।
निर्वाचन आयोग के वकील ने कहा कि किसी शिक्षक ने शिकायत नहीं की है और स्कूल से वास्तव में लिए गए शिक्षकों की संख्या बहुत कम है, जो करीब 14 प्रतिशत है।
उच्च न्यायालय ने मामले की अगली सुनवाई 20 अगस्त को निर्धारित की और उम्मीद जताई कि निर्वाचन आयोग तथा उसके अधिकारी शिक्षकों को चुनावी पुनरीक्षण कार्य सौंपते समय अदालत की टिप्पणियों का ध्यान रखेंगे।
अदालत ने अपने आदेश में कहा, ‘‘निर्वाचन आयोग और उसके अधिकारियों से अपेक्षा की जाती है कि वे स्कूल के बाद के समय या गैर-शिक्षण दिनों में चुनाव संबंधी दायित्व निभाने वाले शिक्षकों की जिम्मेदारियों को ध्यान में रखें। इसलिए शिक्षकों को चुनावी पुनरीक्षण से जुड़ा काम सौंपते समय इन बातों का ध्यान रखा जाए।’’
इसने कहा कि सभी उचित कदम उठाए जाएं ताकि चुनाव संबंधी कार्यों के कारण शिक्षकों पर इतना दबाव न पड़े कि वह उनके लिए असहनीय बोझ बन जाए।
वकील राजेश कुमार गोगना और अशोक अग्रवाल ने अपनी जनहित याचिका में कहा है कि वे दिल्ली के सरकारी, नगर निगम और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में पढ़ने वाले लाखों बच्चों के शिक्षा के मौलिक अधिकार की रक्षा करना चाहते हैं। इन स्कूलों के शिक्षकों को एसआईआर प्रक्रिया में लगाया गया है।
याचिका में दावा किया गया कि आंबेडकर नगर विधानसभा क्षेत्र में 15 सरकारी स्कूलों से 149 शिक्षकों को एसआईआर के लिए लगाया गया है। इसमें दावा किया गया है कि कई स्कूलों में शिक्षण समय के दौरान पूरी तरह नियमित शिक्षकों को हटा लिया गया है और कक्षाएं अतिथि शिक्षकों या अन्य विषयों के शिक्षकों द्वारा संचालित कराई जा रही हैं।
इसमें कहा गया कि यह तैनाती निर्वाचन आयोग बनाम सेंट मैरी स्कूल मामले में तय कानून के विपरीत है और यह शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 की धारा 27 तथा धारा 25-26 का उल्लंघन करती है। इसमें कहा गया कि साथ ही, इसमें जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 159 के तहत उपलब्ध गैर-शिक्षण कर्मचारियों की बड़ी संख्या को नजरअंदाज किया गया है।
जनहित याचिका में अदालत से आग्रह किया गया है कि स्कूल शिक्षकों की तैनाती को ‘‘तर्कसंगत’’ बनाया जाए, इसे अधिकतम 10 प्रतिशत तक सीमित किया जाए और उनकी ड्यूटी शिक्षण समय के बाहर लगाई जाए। याचिका में यह भी अनुरोध किया गया है कि एसआईआर प्रक्रिया के लिए पहले उपलब्ध गैर-शिक्षण कर्मचारियों का उपयोग किया जाए।
भाषा अमित नेत्रपाल
नेत्रपाल