देश में सामाजिक दरारें अब भी गहरी: न्यायमूर्ति भुइयां
देश में सामाजिक दरारें अब भी गहरी: न्यायमूर्ति भुइयां
हैदराबाद, 25 फरवरी (भाषा) उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश उज्ज्वल भुइयां ने बुधवार को कहा कि देश संवैधानिक नैतिकता के मानक से बहुत दूर है। उन्होंने अपनी बेटी की मुस्लिम दोस्त का एक उदाहरण भी दिया, जिसे उसकी धार्मिक पहचान के कारण आवास देने से इनकार कर दिया गया था।
‘तेलंगाना न्यायाधीश संघ’ एवं ‘तेलंगाना राज्य न्यायिक अकादमी’ द्वारा आयोजित एक संगोष्ठी में न्यायमूर्ति भुइयां ने कहा कि संवैधानिक नैतिकता को सार्वजनिक नैतिकता से ऊपर रखा जाना चाहिए, ‘भले ही यह बहुसंख्यक दृष्टिकोण हो।’
उन्होंने यह भी कहा कि हालांकि भारत में कानूनी खर्च अन्य देशों की तुलना में अपेक्षाकृत कम है, लेकिन वकीलों की फीस सहित संबंधित खर्चों के कारण दूरदराज के क्षेत्रों में रहने वाले आम नागरिकों के लिए अदालतों तक पहुंचना लगभग असंभव हो जाता है।
उन्होंने कहा कि कानून नागरिकों से यह अपेक्षा करता है कि वे संवैधानिक नैतिकता को अपना मानक बनाकर उसका पालन करें। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि संविधान का उद्देश्य भाईचारा और बंधुत्व स्थापित करना है।
उन्होंने कहा, ‘संवैधानिक नैतिकता पर जोर इस आधार पर दिया जाता है कि हम घर पर या समुदायों के भीतर जिस नैतिकता का पालन करते हैं, वह संविधान द्वारा हमसे अपेक्षित नैतिकता से कमतर या भिन्न हो सकती है।’
उन्होंने कहा कि इस तरह के अंतर विशेष रूप से विवाह और परिसर किराए पर देने के मामलों में स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं।
उन्होंने अपनी बेटी की एक दोस्त (पीएचडी की छात्रा) का उदाहरण दिया, जिसे दिल्ली में कामकाजी महिलाओं के छात्रावास चलाने वाली मकान मालकिन ने उसकी मुस्लिम पहचान के कारण आवास देने से इनकार कर दिया था।
न्यायपालिका में लैंगिक प्रतिनिधित्व के बारे में न्यायमूर्ति भुइयां ने कहा कि हाल के वर्षों में देशभर में न्यायिक सेवा में महिलाओं की भागीदारी ने गति पकड़ी है।
उन्होंने यह भी कहा कि न्यायपालिका के भीतर लैंगिक प्रतिनिधित्व में सुधार करने के मामले में तेलंगाना ने अग्रणी भूमिका निभाई है।
तेलंगाना की न्यायपालिका में वंचित समुदायों के प्रतिनिधित्व पर उन्होंने कहा कि वहां तीनों संवर्गों में अनुसूचित जाति (एससी) के 76 न्यायिक अधिकारी, अनुसूचित जनजाति (एसटी) के 46 न्यायिक अधिकारी और अल्पसंख्यक समुदायों से 25 अधिकारी कार्यरत हैं।
भाषा शुभम सुरेश
सुरेश

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