ईसाई धर्म अपनाने वाले आदिवासियों का एसटी दर्जा वापस लिया जाना चाहिए : वनवासी कल्याण आश्रम

ईसाई धर्म अपनाने वाले आदिवासियों का एसटी दर्जा वापस लिया जाना चाहिए : वनवासी कल्याण आश्रम

ईसाई धर्म अपनाने वाले आदिवासियों का एसटी दर्जा वापस लिया जाना चाहिए : वनवासी कल्याण आश्रम
Modified Date: May 22, 2026 / 04:05 pm IST
Published Date: May 22, 2026 4:05 pm IST

(आदित्य देव)

नयी दिल्ली, 22 मई (भाषा) अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम के अध्यक्ष सत्येंद्र सिंह ने कहा है कि धर्मांतरण देश के लिए एक बड़ा खतरा है और इससे आदिवासी क्षेत्रों में गहरा प्रभाव पड़ा है जिसके कारण ‘‘गंभीर सामाजिक संघर्ष और विभाजन’’ पैदा हुए हैं। उन्होंने इस समस्या की रोकथाम के लिए संविधान संशोधन की मांग की।

उन्होंने ‘पीटीआई वीडियो’ को दिये विशेष साक्षात्कार में कहा कि ‘‘धर्मांतरण से संबंधित कई समस्याओं’’ का समाधान संविधान के अनुच्छेद 342 में संशोधन में निहित है, ताकि हिंदू धर्म से ईसाई धर्म या इस्लाम में परिवर्तित होने वालों को अनुसूचित जनजाति (एसटी) श्रेणी के तहत मिलने वाले लाभों से वंचित किया जा सके, ठीक उसी तर्ज पर जैसे अनुच्छेद 341 में अनुसूचित जाति (एससी) के सदस्यों के अन्य धर्मों को अपनाने को लेकर प्रावधान हैं।

सिंह ने कहा कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) से संबद्ध वनवासी कल्याण आश्रम मुख्य रूप से शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, आत्मनिर्भरता और सांस्कृतिक जागरूकता जैसे क्षेत्रों में काम करता है। उन्होंने कहा कि इसने इस्लाम, ईसाई धर्म या किसी अन्य गैर-हिंदू धर्म में परिवर्तित हो चुके अनुसूचित जनजाति समुदायों के सदस्यों को ‘सूची से हटाने’ के मुद्दे को आगे बढ़ाने के लिए 2006 में रायपुर में जनजातीय सुरक्षा मंच की स्थापना की।

सिंह ने दावा किया कि आदिवासी समुदाय के एक बड़े हिस्से ने धर्मांतरण किया है। उन्होंने कहा कि जहां भी धर्मांतरण हुआ है, वहां ‘अलगाव’ की एक मजबूत भावना उभर कर सामने आई है।

वनवासी कल्याण आश्रम के अध्यक्ष ने कहा, ‘‘हमारे अपने लोग धीरे-धीरे एक-दूसरे से अलग-थलग पड़ गए। समाज के भीतर ही संघर्ष और विभाजन शुरू हो गए। एक भाई ईसाई बन गया, दूसरा हिंदू ही रहा, और इससे परिवारों और समुदायों के भीतर विभाजन पैदा हो गया।’’

सिंह ने वनवासी कल्याण आश्रम के संस्थापक बालासाहेब देशपांडे का जिक्र करते हुए कहा, ‘‘उन्होंने अपने अंतिम दिनों में कहा था कि हम भले ही जनसेवा में लगे हुए हैं, लेकिन आने वाला समय संघर्ष का काल भी होगा। इसलिए, हमें उस दृष्टिकोण से भी कार्यकर्ताओं को तैयार करने की आवश्यकता होगी।’’

सिंह ने स्वीकार किया कि हिंदू समाज के भीतर सामाजिक भेदभाव और जातिगत विभाजन ने धर्मांतरण में योगदान दिया है।

उन्होंने कहा, ‘‘ धर्मांतरण के पीछे कई कारण हो सकते हैं। हमारे समाज में भी कुछ कमियां मौजूद थीं। लोगों को अधिक स्नेह और समावेश मिलना चाहिए था।’’

सिंह ने आरोप लगाया कि ब्रिटिश शासन के दौरान शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और कल्याणकारी कार्यों के बहाने मिशनरी गतिविधियों का विस्तार हुआ। उन्होंने दावा किया कि ईसाई मिशनरियों द्वारा दिए गए ‘‘प्रलोभनों’’ ने भी धर्मांतरण में अहम भूमिका निभाई।

आरएसएस की अनुषंगी संस्था के अध्यक्ष ने कहा, ‘‘हिंदू समाज में भी जातिगत विभाजन और श्रेष्ठता एवं हीनता की भावनाएं मौजूद थीं। मिशनरियों ने प्रलोभन के साथ-साथ स्नेह भी प्रदान किया, जिससे धर्मांतरण को बल मिला।’’

सिंह के मुताबिक सबसे अधिक धर्मांतरण पूर्वोत्तर राज्यों, झारखंड, छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और केरल में हुआ है।

उन्होंने पूर्व में बिहार, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल के कुछ हिस्सों को मिलाकर ‘वृहद झारखंड’ बनाने की हुई मांग का उल्लेख करते हुए इसे देश को विभाजित करने की साजिश बताया।

सिंह ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ‘‘झारखंड में एक समय तो अलग राष्ट्र – बिहार, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल के कुछ हिस्सों को मिलाकर एक वृहद झारखंड – बनाने की मांग भी उठी थी। हमारे अनुसार, इसकी परिकल्पना मध्य भारत के एक ईसाई-बहुसंख्यक क्षेत्र के रूप में की गई थी। हम इसे देश को विभाजित करने की साजिश का हिस्सा मानते हैं।’’

सिंह ने धर्मांतरण कर चुके अनुसूचित जनजाति के लोगों को एसटी ‘सूची से हटाने’ की मांग की पृष्ठभूमि को स्पष्ट करते हुए पूर्व कांग्रेस सांसद कार्तिक उरांव का जिक्र किया और दावा किया कि उन्होंने संसद में धर्मांतरित आदिवासियों को अनुसूचित जनजाति आरक्षण का लाभ मिलते रहने पर चिंता जताई थी।

वनवासी कल्याण आश्रम अध्यक्ष ने कहा, ‘‘संसद में प्रवेश करने के बाद, उन्होंने संविधान का अध्ययन किया ताकि यह आकलन किया जा सके कि आदिवासी आरक्षण के लाभ वास्तव में लक्षित समुदायों तक पहुंच रहे हैं या नहीं। उन्होंने पूरे देश का दौरा किया और पाया कि धर्मांतरण करने वाले लोगों को लाभों का बड़ा हिस्सा मिल रहा था।’’

उन्होंने कहा, ‘‘उनका मानना ​​था कि जिन लोगों ने धर्मांतरण कर आदिवासी परंपराओं और संस्कृति को त्याग दिया है, उन्हें आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिए। उन्होंने संसद में यह मुद्दा उठाया और इस पर बहस की।’’

सिंह के अनुसार, सरकार द्वारा 1969 में गठित एक संयुक्त समिति ने प्रस्ताव दिया था कि ईसाई धर्म या इस्लाम अपनाने वालों को अनुसूचित जनजाति वर्ग के तहत आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिए।

उन्होंने दावा किया कि राजनीतिक दबाव के कारण 1970 में संसद भंग होने के बाद यह प्रस्ताव आगे नहीं बढ़ सका।

सिंह ने कहा, ‘‘यह दलील दी गई कि यदि प्रस्ताव पारित हो गया तो ईसाई धर्म को कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा। जिन निधियों और पूरे नेटवर्क के माध्यम से गतिविधियां और प्रचार किया जा रहा था, वे प्रभावित होंगे। सरकारी नौकरियों में आरक्षण का लाभ उठाने वाले भी उन लाभों से वंचित हो जाएंगे। इसलिए कई पक्षों द्वारा जबरदस्त दबाव बनाया गया। कार्तिक उरांव ने इस मामले पर विस्तार से चर्चा की थी।’’

उन्होंने कहा कि लेकिन दिसंबर 1970 में लोकसभा भंग हो गई। (तत्कालीन प्रधानमंत्री)इंदिरा गांधी ने कहा कि इस मामले पर बाद में विचार किया जाएगा। कार्तिक उरांव का निधन दिसंबर 1981 में हो गया।

सिंह ने कहा, ‘‘उस प्रस्ताव में कई समस्याओं के समाधान थे।’’

वनवासी कल्याण आश्रम अध्यक्ष ने दावा किया कि बी आर आंबेडकर और जगजीवन राम जैसे नेताओं ने अपने समुदायों को धर्मांतरण से बचाया, लेकिन आदिवासी समाज में कार्तिक उरांव जैसे नेता बहुत कम थे।

उन्होंने कहा, “इसके परिणामस्वरूप जनजातीय आरक्षण का आधार धर्म के बजाय जनजाति बना रहा। कोई व्यक्ति ईसाई, इस्लाम, पारंपरिक आस्थाओं का पालन करता हो या किसी भी धर्म को नहीं मानता हो, उसे जनजातीय आरक्षण का लाभ मिलता रहा। हमारे अनुसार, यही एक खामी थी।”

सिंह ने कहा, “इस मुद्दे को आगे बढ़ाने के लिए वनवासी कल्याण आश्रम ने 2006 में रायपुर में जनजातीय सुरक्षा मंच की स्थापना की। इसके मार्गदर्शन में यह आंदोलन आज भी जारी है, क्योंकि हमारे अनुसार धार्मिक परिवर्तन देश के लिए एक खतरा है।”

भाषा धीरज पवनेश

पवनेश


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