एकनाथ शिंदे गुट को असली शिवसेना की मान्यता के विरुद्ध याचिकाओं पर शीर्ष अदालत में अंतिम सुनवाई शुरू

एकनाथ शिंदे गुट को असली शिवसेना की मान्यता के विरुद्ध याचिकाओं पर शीर्ष अदालत में अंतिम सुनवाई शुरू

एकनाथ शिंदे गुट को असली शिवसेना की मान्यता के विरुद्ध याचिकाओं पर शीर्ष अदालत में अंतिम सुनवाई शुरू
Modified Date: August 5, 2026 / 08:41 pm IST
Published Date: August 5, 2026 8:41 pm IST

(फाइल फोटो के साथ)

नयी दिल्ली, पांच अगस्त (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने एकनाथ शिंदे गुट को ‘असली शिवसेना’ की मान्यता देने के निर्वाचन आयोग के निर्णय के विरुद्ध उद्धव ठाकरे गुट की याचिकाओं पर अंतिम सुनवाई बुधवार को आरंभ की।

शीर्ष अदालत ने कहा कि राजनीतिक पार्टी का अपने विधायक दल पर नियंत्रण बना रहता है और उसके वैध फैसले ही मान्य होने चाहिए।

हालांकि, उच्चतम न्यायालय ने निर्वाचित प्रतिनिधियों को राजनीतिक निर्णय लेने के लिए कुछ ‘‘गुंजाइश’ देने का भी समर्थन किया, अगर उनमें से ज़्यादातर लोग राजनीतिक पार्टी के निर्देशों से ‘सचमुच असहमत’ हों।

प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की खंडपीठ ने 2024 में दायर की गयी उन दो याचिकाओं पर अंतिम सुनवाई शुरू की, जिनमें निर्वाचन आयोग के आदेश को चुनौती दी गई है।

निर्वाचन आयोग ने महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के गुट को शिवसेना का मूल चुनाव चिह्न ‘धनुष-बाण’ आवंटित किया था।

इन याचिकाओं में शिंदे गुट को असली शिवसेना के तौर पर मान्यता देने के निर्वाचन आयोग के 17 फरवरी, 2023 के आदेश को चुनौती दी गयी है।

आरंभ में, ठाकरे के नेतृत्व वाली पार्टी की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा कि निर्वाचन आयोग ने पार्टी के संविधान को नजरअंदाज किया, जबकि उसे शिवसेना का संशोधित संविधान मार्च 2013 में मिल चुका था तथा यह संविधान निर्वाचन आयोग की वेबसाइट पर अब भी उपलब्ध है।

सिब्बल ने कहा कि मुख्य मुद्दा यह है कि क्या पार्टी विधायक दल, राजनीतिक पार्टी से आगे निकलकर उसपर कब्ज़ा कर सकता है। उन्होंने तर्क दिया कि इसका जवाब ‘नहीं’ है।

उन्होंने कहा, ‘‘कानून तो यही है… लेकिन अब कुछ नया हो रहा है। और यह सिर्फ़ इस मामले तक सीमित नहीं है। दल-बदल का एक बिल्कुल नया दौर शुरू हो गया है। अब होता यह है कि किसी राजनीतिक पार्टी के बिना ही, उसका विधायक दल किसी दूसरी राजनीतिक पार्टी में विलय कर लेता है।”

सिब्बल ने कहा, “एक चुनाव चिह्न पर चुनाव लड़ने के बाद, इसके सदस्य किसी अन्य निशान पर दूसरी राजनीतिक पार्टी का प्रतिनिधित्व करते हैं। आप इस तरह की चालबाज़ी को इतनी हद तक ले जा रहे हैं कि पूरी चुनावी प्रक्रिया ही मज़ाक बनकर रह जाती है, क्योंकि हेर-फेर और दल-बदल के जरिये चुनावी नतीजों को बदला जा सकता है। जो सरकार बनती है, वह वैसी सरकार नहीं होती, जिसे लोगों ने वोट दिया हो। इसके बहुत गंभीर नतीजे होते हैं।”

न्यायमूर्ति बागची ने दलीलों पर गौर करते हुए मौखिक रूप से कहा, ‘‘विधायक दल पर राजनीतिक पार्टी का नियंत्रण बना रहता है। राजनीतिक दल का कोई भी वैध निर्णय, विधायक दल के बहुमत की इच्छा पर भी हावी होता है।’’

इसके बाद न्यायमूर्ति बागची ने एक फैसले का ज़िक्र किया और कहा कि उसमें दल-बदल के मुद्दे पर विचार किया गया था।

न्यायमूर्ति बागची ने कहा, “लेकिन इस मामले की तरह, चुनाव से पहले और चुनाव के बाद गठबंधन से जुड़े सवाल भी हो सकते हैं। हम एस आर बोम्मई (फैसले) या किसी दूसरे सिद्धांत पर दोबारा विचार करने के मुद्दे पर नहीं जा रहे हैं।”

न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि मान लीजिए कि कोई राजनीतिक पार्टी चुनाव से पहले किसी दूसरी पार्टी के साथ गठबंधन करती है और उसी आधार पर वोट मांगती है, लेकिन चुनाव के बाद वह विपक्षी पार्टियों में से किसी एक के साथ मिलकर सरकार बनाने का फैसला करती है।

न्यायमूर्ति बागची ने कहा, “ऐसी स्थिति में, अगर ज़्यादातर विधायक सचमुच इससे सहमत नहीं हैं और कोई अलग रुख अपनाना चाहते हैं, तो भी उन्हें अपनी राजनीतिक पार्टी के पास ही वापस जाना होगा।”

न्यायमूर्ति बागची ने कहा, ‘‘हमें संसदीय लोकतंत्र में प्रतिनिधि भागीदारी को समझना होगा। साथ ही, हमें निर्वाचित प्रतिनिधियों को अपनी पहचान खोए बिना राजनीतिक फैसले लेने की कुछ गुंजाइश भी देनी चाहिए।’’

इसके बाद खंडपीठ ने पूछा कि चुनाव चिह्न राजनीतिक पार्टी का होता है या विधायक दल के नेता का।

सिब्बल ने कहा कि चुनाव चिह्न हमेशा राजनीतिक पार्टी का ही होता है।

उन्होंने महाराष्ट्र विधानसभा के अध्यक्ष के उस फ़ैसले पर सवाल उठाया, जिसमें उन्होंने विधायी बहुमत के आधार पर विरोधी गुट को मान्यता दी थी। उन्होंने कहा कि यह फ़ैसला 2023 के महाराष्ट्र राजनीतिक संकट के दौरान उच्चतम न्यायालय की संविधान पीठ द्वारा दिए गए फ़ैसले के खिलाफ है।

वर्ष 2018 के पार्टी रिकॉर्ड का ज़िक्र करते हुए सिब्बल ने कहा कि एकनाथ शिंदे को उद्धव ठाकरे की अगुवाई वाली पार्टी संरचना में शिवसेना की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य के तौर पर दिखाया गया था, जिसमें उद्धव ठाकरे ‘पक्ष प्रमुख’ थे।

उन्होंने कहा कि बंटवारे से पहले, दोनों गुटों ने 2013 और 2018 के पार्टी संविधानों की वैधता को स्वीकार किया था।

उन्होंने कहा कि ठाकरे के नेतृत्व में शिवसेना ने 2014 और 2019 के बीच पार्टी के उसी संविधान के तहत लगातार लोकसभा एवं महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव लड़े और जीते।

सिब्बल ने कहा कि इस पूरे समय के दौरान, निर्वाचन आयोग और विधायी अधिकारियों समेत संवैधानिक अधिकारियों ने ठाकरे के नेतृत्व को मान्यता दी तथा कभी भी पार्टी के संविधान की वैधता या संगठन का नेतृत्व करने के उनके अधिकार पर सवाल नहीं उठाया।

उन्होंने कहा कि निर्वाचन आयोग ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर काम किया, क्योंकि ‘चुनाव चिह्न (आरक्षण और आवंटन) आदेश’ के अनुच्छेद 15 के तहत उसे किसी राजनीतिक दल के संविधान की वैधता तय करने का अधिकार नहीं था।

उन्होंने कहा कि निर्वाचन आयोग ने गलत आधार पर यह मान लिया कि 2013 और 2018 के संविधान रिकॉर्ड में नहीं थे, और इसी वजह से उसने पार्टी की पहचान तय करने के लिए विधायी बहुमत को ही मुख्य आधार माना।

इस मामले की सुनवाई बृहस्पतिवार को जारी रहेगी।

भाषा

राजकुमार सुरेश

सुरेश


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