भ्रष्टाचार रोधी अधिनियम की धारा 17ए पर उच्चतम न्यायालय ने सुनाया खंडित फैसला

भ्रष्टाचार रोधी अधिनियम की धारा 17ए पर उच्चतम न्यायालय ने सुनाया खंडित फैसला

भ्रष्टाचार रोधी अधिनियम की धारा 17ए पर उच्चतम न्यायालय ने सुनाया खंडित फैसला
Modified Date: January 13, 2026 / 11:50 am IST
Published Date: January 13, 2026 11:50 am IST

नयी दिल्ली, 13 जनवरी (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने लोकसेवकों के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामलों की जांच शुरू करने से पहले अनुमति लेने से संबंधित भ्रष्टाचार रोधी कानून की 2018 की धारा की संवैधानिक वैधता पर मंगलवार को खंडित निर्णय सुनाया।

न्यायमूर्ति बीवी नागरथना ने कहा कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17ए असंवैधानिक है और इसे रद्द किया जाना चाहिए।

उन्होंने कहा, “पूर्वानुमति की आवश्यकता भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के विरुद्ध है; इससे जांच में रुकावट आती है और भ्रष्ट अधिकारियों को बचने का मौका मिल जाता है।”

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वहीं, न्यायमूर्ति केवी विश्वनाथन ने धारा को संवैधानिक मानते हुए ईमानदार अधिकारियों की सुरक्षा की जरूरत पर जोर दिया।

अब यह मामला भारत के प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत के समक्ष रखा जाएगा, ताकि इसे सुनवाई के लिए एक वृहद पीठ के सामने रखा जा सके और अंतिम निर्णय लिया जा सके।

साल 2018 में पेश की गई भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 17ए के तहत सक्षम प्राधिकारी की अनुमति के बिना किसी लोकसेवक पर मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।

उच्चतम न्यायालय ने एनजीओ ‘सेंटर फॉर पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन’ (सीपीआईएल) की जनहित याचिका (पीआईएल) पर यह निर्णय सुनाया है, जिसमें भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की संशोधित धारा 17ए की वैधता को चुनौती दी गई थी।

भाषा जोहेब मनीषा

मनीषा


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