डीजीपी की दौड़ से वरिष्ठ आईपीएस का नाम हटाने पर शीर्ष अदालत ने ओडिशा सरकार से पूछे सवाल

डीजीपी की दौड़ से वरिष्ठ आईपीएस का नाम हटाने पर शीर्ष अदालत ने ओडिशा सरकार से पूछे सवाल

डीजीपी की दौड़ से वरिष्ठ आईपीएस का नाम हटाने पर शीर्ष अदालत ने ओडिशा सरकार से पूछे सवाल
Modified Date: September 24, 2026 / 10:17 pm IST
Published Date: September 24, 2026 10:17 pm IST

नयी दिल्ली, 24 सितंबर (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने बृहस्पतिवार को ओडिशा सरकार से पूछा कि क्या उसने भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) के उस वरिष्ठ अधिकारी को आरोपी की श्रेणी में रखा है, जिनका नाम सीबीआई के यह कहने के बाद डीजीपी पद की दौड़ में शामिल अधिकारियों की सूची से हटा दिया गया था कि उनसे एक भर्ती परीक्षा घोटाले के सिलसिले में पूछताछ की जरूरत पड़ सकती है।

ओडिशा सरकार ने राज्य के निवर्तमान पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) के उत्तराधिकारी के चयन के लिए मई में संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) को 11 वरिष्ठ आईपीएस अधिकारियों की सूची भेजी थी।

हालांकि, केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) के यह कहने के बाद कि भर्ती परीक्षा घोटाले के सिलसिले में सुशांत कुमार नाथ से पूछताछ की जरूरत पड़ सकती है, ओडिशा सरकार ने सूची से उनका नाम वापस ले लिया था।

प्रक्रिया के मुताबिक, राज्यों को डीजीपी रैंक के ऐसे अधिकारियों के नाम प्रस्तावित करने चाहिए, जो वरिष्ठता और पात्रता मानकों को पूरा करते हों तथा जिनकी (डीजीपी पद पर) रिक्ति की तारीख से लेकर (उनकी) सेवानिवृत्ति की तिथि तक कम से कम छह महीने की सेवा बची हो।

प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी मोहना की पीठ ने ओडिशा सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से पूछा कि क्या राज्य सरकार नाथ का सत्यनिष्ठा प्रमाणपत्र रोककर उन्हें आरोपी की श्रेणी में रख रही है।

न्यायमूर्ति बागची ने मौखिक रूप से कहा, “सत्यनिष्ठा प्रमाणपत्र रोकना बहुत बड़ा कदम है। क्या आप उन्हें (नाथ को) आरोपी की श्रेणी में रख रहे हैं?”

उन्होंने कहा, “अगर यह कहा जाता है कि सिर्फ इसलिए कि ऐसा कोई मामला लंबित है, सत्यनिष्ठा प्रमाणपत्र रोका जा सकता है, हमें ऐसा निष्कर्ष निकालने के लिए मजबूर होना पड़ेगा, जो असल में गलत या बेतुका होगा।”

शीर्ष अदालत उस जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें आरोप लगाया गया है कि ओडिशा सरकार डीजीपी पद के संभावित उम्मीदवारों की सूची में एक कनिष्ठ अधिकारी का नाम शामिल करने की कोशिश कर रही है, जो 2006 के ‘प्रकाश सिंह मामले’ में न्यायालय की ओर से जारी दिशा-निर्देशों का उल्लंघन है।

मेहता ने पीठ से कहा कि राज्य सरकार ने ‘प्रकाश सिंह मामले’ के दिशा-निर्देशों के अनुसार डीजीपी के सेवानिवृत्त होने से छह महीने पहले ही उनके उत्तराधिकारी की भर्ती की प्रक्रिया शुरू कर दी थी।

उन्होंने कहा कि सीबीआई ने राज्य सरकार को बताया कि नाथ ओडिशा पुलिस भर्ती बोर्ड के अध्यक्ष हैं, जो पुलिस उपनिरीक्षकों की भर्ती के लिए परीक्षा आयोजित कर रहा है।

मेहता के मुताबिक, “सीबीआई ने बताया कि पूरी परीक्षा प्रक्रिया की जांच की जा रही है, जिसमें परीक्षा आयोजित करने वाली एजेंसियों, ओडिशा पुलिस भर्ती बोर्ड और अन्य की भूमिका भी शामिल है।”

उन्होंने कहा, “सीबीआई ने हमें चार अगस्त 2026 को बताया था कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा-17ए के तहत संबंधित अधिकारियों से पूछताछ की अनुमति मांगी गई है, जो लंबित है। जांच एजेंसी ने कहा था कि अनुमति मिलने और उन अधिकारियों से पूछताछ के बाद, आईपीएस अधिकारी सुशांत कुमार नाथ से भी पूछताछ की जरूरत पड़ सकती है।”

मेहता ने पीठ को बताया कि सीबीआई की जांच जारी है। उन्होंने कहा कि नाथ के प्रदर्शन मूल्यांकन में आपराधिक जांच के बारे में कोई जिक्र नहीं है।

मेहता ने कहा कि सीबीआई के अनुरोध के बाद राज्य सरकार ने संशोधित सूची भेजी, जिसमें नाथ का नाम हटा दिया गया और केवल 10 अधिकारियों के संबंध में सत्यनिष्ठा प्रमाणपत्र शामिल करते हुए उन पर विचार करने की सिफारिश की गई।

उन्होंने कहा, “अत्यधिक सावधानी और उचित जांच-पड़ताल के तहत राज्य ने सभी पात्र अधिकारियों के सत्यनिष्ठा प्रमाणपत्रों की समीक्षा की। ऐसा केवल एक व्यक्ति के लिए नहीं किया गया था। अगर किसी अन्य अधिकारी के बारे में भी कुछ आपत्तिजनक पाया जाता, तो उसकी जानकारी भी उचित तरीके से दी जाती।”

मेहता ने कहा कि राज्य सरकार ने सभी पात्र अधिकारियों के सत्यनिष्ठा प्रमाणपत्र की समीक्षा की और पुनर्विचार के बाद नाथ के मामले में सत्यनिष्ठा प्रमाणपत्र रोकने का फैसला किया।

नाथ की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता करुणा नंदी ने कहा कि आईपीएस अधिकारी (नाथ) का रिकॉर्ड शानदार रहा है और उनके खिलाफ कोई शिकायत नहीं दर्ज कराई गई है।

नंदी ने कहा, “नाथ के खिलाफ सिर्फ सीबीआई का एक पत्र है, जिसमें कहा गया है कि ‘उनसे पूछताछ की जरूरत पड़ सकती है।’ एक भी प्राथमिकी में उनके नाम का जिक्र तक नहीं है। निश्चित रूप से उन्हें आरोपी नहीं बनाया गया है। जांच जारी है और लीक हुए प्रश्न-पत्र कभी नहीं मिले।”

मामले की अगली सुनवाई 29 सितंबर को होगी।

‘प्रकाश सिंह’ मामले में शीर्ष अदालत के 2006 के फैसले और उसके बाद दिए गए दिशा-निर्देशों में कहा गया था कि किसी राज्य के डीजीपी का चयन राज्य सरकार द्वारा विभाग के उन तीन सबसे वरिष्ठ अधिकारियों में से किया जाएगा, जिन्हें यूपीएससी ने उनकी सेवा की अवधि, शानदार रिकॉर्ड और पुलिस बल का नेतृत्व करने के अनुभव के आधार पर उस पद पर पदोन्नति के लिए सूचीबद्ध किया है।

न्यायालय ने कहा था कि एक बार पद के लिए चुने जाने के बाद, संबंधित अधिकारी का कार्यकाल कम से कम दो साल का होना चाहिए, चाहे सेवानिवृत्ति की तारीख कोई भी हो।

भाषा पारुल सुरेश

सुरेश


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