तमिलनाडु सरकार ने इस्लाम अपनाने वालों के लिए आरक्षण का लाभ खत्म करने के फैसले को न्यायालय में चुनौती दी

तमिलनाडु सरकार ने इस्लाम अपनाने वालों के लिए आरक्षण का लाभ खत्म करने के फैसले को न्यायालय में चुनौती दी

तमिलनाडु सरकार ने इस्लाम अपनाने वालों के लिए आरक्षण का लाभ खत्म करने के फैसले को न्यायालय में चुनौती दी
Modified Date: July 8, 2026 / 06:30 pm IST
Published Date: July 8, 2026 6:30 pm IST

नयी दिल्ली, आठ जुलाई (भाषा) तमिलनाडु सरकार ने मद्रास उच्च न्यायालय के उस फैसले के खिलाफ शीर्ष अदालत का रुख किया है, जिसमें कहा गया है कि इस्लाम अपनाने वाला कोई व्यक्ति सिर्फ धर्मांतरण के आधार पर ‘पिछड़ा वर्ग (मुस्लिम)’ श्रेणी के तहत आरक्षण का दावा करने का हकदार नहीं है।

राज्य सरकार के सचिव ने उच्च न्यायालय के उस फैसले के खिलाफ याचिका दायर की है, जिसके तहत नौ मार्च 2024 को जारी सरकारी आदेश (जीओ) को असंवैधानिक घोषित कर दिया गया था।

उक्त जीओ में पिछड़े वर्गों (बीसी), अति पिछड़े वर्गों (एमबीसी), विमुक्त समुदायों (डीएनसी) और अनुसूचित जातियों (एससी) से जुड़े उन लोगों को पिछड़ा वर्ग (मुस्लिम) मानने की अनुमति दी गई थी, जिन्होंने बाद में इस्लाम अपना लिया था। जीओ में ऐसे लोगों को आरक्षण का लाभ हासिल करने के लिए सात अधिसूचित मुस्लिम समुदायों में से किसी एक के तहत सामुदायिक प्रमाण-पत्र प्राप्त करने की भी इजाजत दी गई थी।

न्यायमूर्ति जीआर स्वामीनाथन और न्यायमूर्ति पीबी बालाजी की खंडपीठ ने जीओ को रद्द करते हुए कहा था कि यह उच्चतम न्यायालय और मद्रास उच्च न्यायालय, दोनों के बाध्यकारी न्यायिक फैसलों के खिलाफ था।

उच्च न्यायालय ने कहा था कि इस्लाम अपनाने वाले किसी व्यक्ति को केवल मुसलमान ही माना जा सकता है। उसने कहा था कि ऐसे व्यक्ति को सिर्फ धर्मांतरण के आधार पर आरक्षण के मकसद से किसी खास अधिसूचित ‘पिछड़ा वर्ग (मुस्लिम)’ समुदाय का सदस्य नहीं माना जा सकता।

यह फैसला समीर अहमद की याचिका पर सुनाया गया था, जिसने 2015 में हिंदू धर्म छोड़कर इस्लाम अपना लिया था और 2016 में एक गजट अधिसूचना के जरिये इस बदलाव की जानकारी दी गई थी।

समीर ने इस्लामी रीति-रिवाजों से शादी की और आरक्षण का लाभ लेने के लिए ‘मुस्लिम लेब्बाई’ समुदाय का सदस्य होने का प्रमाणपत्र जारी किए जाने का आवेदन दिया।

हालांकि, तहसीलदार ने समीर की अर्जी खारिज कर दी, जिसके बाद उसे उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।

भाषा पारुल रंजन

रंजन


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