तमिलनाडु ‘हिंदी उपनिवेशवाद’ को बर्दाश्त नहीं करेगा: स्टालिन

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तमिलनाडु ‘हिंदी उपनिवेशवाद’ को बर्दाश्त नहीं करेगा: स्टालिन

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  • Publish Date - March 7, 2025 / 08:48 PM IST,
    Updated On - March 7, 2025 / 08:48 PM IST

चेन्नई, सात मार्च (भाषा) तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम. के. स्टालिन ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान पर हिंदी थोपने की धमकी देकर राज्य को उकसाने का आरोप लगाते हुए शुक्रवार को कहा कि राज्य ‘‘ब्रिटिश उपनिवेशवाद की जगह लेने वाले हिंदी उपनिवेशवाद’’ को बर्दाश्त नहीं करेगा।

स्टालिन ने सोशल मीडिया पर लिखा, ‘‘पेड़ शांत रहना पसंद कर सकता है, लेकिन हवा शांत नहीं होगी। हम जब बस अपना काम कर रहे थे, तब वह केंद्रीय शिक्षा मंत्री ही थे, जिन्होंने हमें पत्र लिखने के लिए उकसाया। वह अपनी जगह भूल गए और पूरे राज्य को हिंदी लागू करने के लिए धमकाने की हिम्मत की और अब इसके परिणामस्वरूप उन्होंने एक ऐसी लड़ाई को फिर से शुरू कर दिया है, जिसे वह कभी नहीं जीत सकते। तमिलनाडु को आत्मसमर्पण करने के लिए ‘ब्लैकमेल’ नहीं किया जाएगा।’’

‘‘हिंदी थोपे जाने’’ के खिलाफ स्टालिन द्रविड़ मुनेत्र कषगम (द्रमुक) कार्यकर्ताओं को लगातार पत्र लिख रहे हैं।

स्टालिन ने कहा, ‘‘सबसे बड़ी विडंबना यह है कि एनईपी (राष्ट्रीय शिक्षा नीति) को खारिज करने वाला तमिलनाडु इसके कई लक्ष्यों को पहले ही पूरा कर चुका है, जिन्हें नीति के तहत 2030 तक पूरा किया जाना है। यह एलकेजी (‘लोअर किंडरगार्टन’) के छात्र द्वारा पीएचडी धारक को व्याख्यान देने जैसा है। द्रविड़म दिल्ली से निर्देश नहीं लेता। इसके बजाय, वह ऐसा मार्ग प्रशस्त करता है, जिसका अनुसरण राष्ट्र कर सके। अब तीन-भाषा सूत्र के लिए भाजपा का ‘सर्कस’ जैसा हस्ताक्षर अभियान तमिलनाडु में हंसी का पात्र बन गया है। मैं उन्हें चुनौती देता हूं कि वे 2026 के विधानसभा चुनावों में इसे अपना मुख्य एजेंडा बनाएं और इसे हिंदी थोपने पर जनमत संग्रह बनने दें।’’

द्रमुक नेता ने साथ ही लिखा, ‘‘इतिहास स्पष्ट है। जिन्होंने तमिलनाडु पर हिंदी थोपने की कोशिश की, वे या तो हार गए या बाद में अपना नजरिया बदल लिया और द्रमुक के रुख से सहमत हो गए। तमिलनाडु ब्रिटिश उपनिवेशवाद की जगह लेने वाले हिंदी उपनिवेशवाद को बर्दाश्त नहीं करेगा। योजनाओं के नाम से लेकर पुरस्कारों और केंद्र सरकार की संस्थाओं तक, हिंदी को घृणित सीमा तक थोपा गया है जिससे उन गैर-हिंदी भाषी लोगों का दम घुट रहा है जो भारत में बहुसंख्यक हैं। लोग आते हैं, लोग जाते हैं, लेकिन भारत में हिंदी का प्रभुत्व खत्म होने के लंबे समय बाद भी इतिहास याद रखेगा कि यह द्रमुक ही थी, जो अगुआ के रूप में खड़ी थी।’’

भाषा सिम्मी दिलीप

दिलीप