तसलीमा नसरीन 19 साल बाद कोलकाता लौटीं, उन्होंने इसे घरवापसी बताया

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तसलीमा नसरीन 19 साल बाद कोलकाता लौटीं, उन्होंने इसे घरवापसी बताया

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  • Publish Date - July 31, 2026 / 02:53 PM IST,
    Updated On - July 31, 2026 / 02:53 PM IST

कोलकाता, 31 जुलाई (भाषा) निर्वासन में रह रहीं बांग्लादेशी लेखिका तसलीमा नसरीन शुक्रवार को लगभग 19 साल बाद कोलकाता लौटीं तथा उन्होंने इस यात्रा को उस शहर (कोलकाता) में भावनात्मक घरवापसी बताया जिसे वह आज भी अपना मानती हैं।

उनका आगमन शनिवार को होने वाले एक साहित्यिक कार्यक्रम से ठीक पहले हुआ है जिसे पश्चिम बंगाल की नई भाजपा सरकार के तहत राजनीतिक रूप से अहम माना जा रहा है।

यहां नेताजी सुभाष चंद्र बोस अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर स्वागत के लिए इंतजार कर रहे लोगों का नसरीन ने हाथ जोड़कर अभिवादन किया और कहा, ‘‘वापस आकर मुझे बहुत अच्छा लग रहा है।’’

यह उनकी नवंबर 2007 के बाद कोलकाता की पहली यात्रा है। उस समय अपनी रचनाओं के विरोध में हुए हिंसक प्रदर्शनों के कारण उन्हें शहर छोड़ना पड़ा था।

बांग्लादेश से निर्वासन के बाद वह कोलकाता को अक्सर अपने घर जैसा सबसे निकट का स्थान बताया करती थीं।

लेखिका यहां रवींद्र सदन में कट्टरपंथ-विरोधी साहित्यिक कार्यक्रम में पहली बार सार्वजनिक रूप से शामिल होंगी। उम्मीद है कि वह कार्यक्रम में कविता-पाठ करेंगी।

इस कार्यक्रम में मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी और मशहूर लेखक शीर्षेंदु मुखोपाध्याय एवं अन्य लोगों के शामिल होने की उम्मीद है।

हालांकि, इसकी एक साहित्यिक कार्यक्रम के तौर पर परिकल्पना की गयी, लेकिन पश्चिम बंगाल में भाजपा सरकार बनने के कुछ माह बाद तथा अभिव्यक्ति की आजादी, धर्मनिरपेक्षता और धार्मिक भावनाओं के प्रति राज्य के रवैये पर फिर से शुरू हुई बहस के बीच यह कार्यक्रम राजनीतिक रूप से अहम हो गया है।

अपनी यात्रा से पहले, नसरीन ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा था कि कोलकाता लौटना उन्हें ‘‘अपने ही देश’’ में लौटने जैसा लगता है।

उन्होंने कहा था, ‘‘मुझे ऐसा लगता है जैसे मैं अपने ही देश लौट रही हूं। मेरे दिल में बंगाल कभी भी किसी सीमा या कंटीले तारों की बाड़ से बंटा नहीं रहा। बंगाल के पूर्वी हिस्से का दरवाजा मेरे लिए बंद है, इसलिए अभी के लिए, बंगाल का यही हिस्सा मेरा घर है।’’

उन्होंने कहा कि वह ‘खुशी, लेकिन साथ ही दर्द’ के साथ लौट रही हैं। उन्होंने कहा कि उन्हें याद आया कि कोलकाता ने उन्हें घर, दोस्त, पाठक और अपनापन दिया था, लेकिन बाद में उन्हें वहां से जाने के लिए मजबूर कर दिया गया।

इस यात्रा को सिर्फ निजी तौर पर घर वापसी से कहीं अधिक बताते हुए नसरीन ने कहा कि यह उस आवाज की वापसी का प्रतीक है जिसे धार्मिक कट्टरपंथियों ने कभी दबाने की कोशिश की थी।

उन्होंने उनकी वापसी को सुगम बनाने एवं उन्हें सुरक्षा उपलब्ध कराने के लिए आयोजकों एवं वर्तमान पश्चिम बंगाल सरकार को धन्यवाद दिया।

अपने उपन्यास ‘लज्जा’ को लेकर मिली जान से मारे जाने की धमकियों के कारण 1994 में बांग्लादेश से भागने के बाद, नसरीन 2004 में कोलकाता में बस गईं और बांग्ला भाषी इस शहर को निर्वासन के दौरान अपनी सांस्कृतिक शरणस्थली के रूप में अपनाया।

नवंबर 2007 में यह संबंध अचानक खत्म हो गया, जब उनकी आत्मकथा ‘द्विखंडितो’ के कुछ हिस्सों को लेकर हिंसक विरोध-प्रदर्शन शुरू हो गए। इस किताब पर तत्कालीन वाममोर्चा सरकार ने 2003 में ही प्रतिबंध लगा दिया था, क्योंकि आरोप था कि इसने मुस्लिम समुदाय के कुछ वर्गों की भावनाओं को आहत किया था।

जैसे-जैसे विरोध प्रदर्शन बढ़े और कोलकाता के कुछ हिस्सों में शांति बहाल करने के लिए सेना को तैनात करना पड़ा, तत्कालीन बुद्धदेव भट्टाचार्य सरकार ने नसरीन से शहर छोड़ने को कहा था।

उन्हें पहले जयपुर और बाद में दिल्ली स्थानांतरित किया गया, और अंततः वे विदेश चली गईं।

हालांकि, उन्होंने बार-बार अपनी यह इच्छा व्यक्त की कि वह कोलकाता लौटना चाहती हैं, भले ही केवल साहित्यिक कार्यक्रमों में भाग लेने के लिए ही क्यों न हो।

करीब दो दशकों तक उनकी यह वापसी संभव नहीं हो सकी, जबकि इस दौरान लेखकों और नागरिक समाज की ओर से समय-समय पर अपीलें की गईं और कभी-कभार राजनीतिक स्तर पर भी प्रयास हुए।

यह मुद्दा पिछले वर्ष फिर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आया, जब भाजपा के राज्यसभा सांसद और पश्चिम बंगाल भाजपा के मौजूदा अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य ने संसद में केंद्र सरकार से उनकी वापसी सुनिश्चित करने की मांग की। उन्होंने नसरीन को इस्लामी कट्टरपंथ के खिलाफ निर्भीक आवाज बताते हुए उनके भारत लौटने की व्यवस्था करने का आग्रह किया।

भाषा राजकुमार संतोष

संतोष