प्रौद्योगिकी अदालतों को अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी और बेहतर ढंग से निभाने में मदद करती: सीजेआई
प्रौद्योगिकी अदालतों को अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी और बेहतर ढंग से निभाने में मदद करती: सीजेआई
नयी दिल्ली, छह अगस्त (भाषा) प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने बृहस्पतिवार को कहा कि प्रौद्योगिकी एक ऐसा साधन है, जो अदालतों को अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी को और बेहतर ढंग से निभाने में मदद करती है।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन (एससीएओआरए) के एक कार्यक्रम में कहा कि अदालती प्रक्रियाओं के डिजिटलीकरण से धीरे-धीरे एक पूरी तरह से एकीकृत डिजिटल न्याय पारिस्थितिकी तैयार हुई है।
उन्होंने कहा, ‘‘पिछले दो दशकों में, हमारी कोशिश रही है कि अदालतों को अधिक सुलभ, पारदर्शी और न्याय की आस वाले हर व्यक्ति के प्रति अधिक जवाबदेह बनाया जाए।’’
न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा, ‘‘हमारी समझ है कि प्रौद्योगिकी अपने आप कोई काम नहीं करती। यह एक ऐसा जरिया है जो अदालतों को अपनी संवैधानिक ज़िम्मेदारी और बेहतर ढंग से निभाने में मदद करती है।’’
देश के 53वें प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि प्रौद्योगिकी ने कानूनी पेशे में सभी के लिए समान अवसर पैदा करने और पेशेवर मौकों को सबके लिए सुलभ बनाने में मदद की है।
उन्होंने कहा, ‘‘संभवत: इसका सबसे अधिक लाभ वादियों को ही होता है। वे ऑनलाइन अपने मुकदमे की प्रगति देख सकते हैं, अदालत की कार्यवाही में ऑनलाइन हिस्सा ले सकते हैं और बिना महंगे और समय लेने वाले सफर के आवश्यक कानूनी जानकारी हासिल कर सकते हैं।’’
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई)न्यायिक प्रशासन को बेहतर बनाने के लिए अभूतपूर्व अवसर प्रदान करता है।
उन्होंने कहा, ‘‘फिर भी, जैसा कि मैंने इस विषय पर अपने कई व्याख्यानों और संबोधनों में टिप्पणी की है, कृत्रिम बुद्धिमत्ता न्यायिक समझ की जगह लिये बिना न्यायिक समझ को बेहतर बना सकता है। प्रौद्योगिकी बहुत तेजी से आंकड़ों को प्रस्तुत कर सकती हैं, लेकिन न्याय के लिए आखिरकार समझदारी, सहानुभूति और सोच-समझकर लिये गए इंसानी फैसले की जरूरत होती है।’’
न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि जैसे-जैसे अलग-अलग अधिकार-क्षेत्रों की न्यायपालिकाएं एक-दूसरे के अनुभवों से सीख रही हैं, वैसे-वैसे ऐसी न्याय प्रणालियां बनाने की कोशिश की जानी चाहिए, जो नई सोच वाली हों, आसानी से उपलब्ध हों और नागरिकों के भरोसे के काबिल हों।
अफ्रीकी देश जाम्बिया के उच्चतम न्यायालय की न्यायाधीश आभा नायर पटेल ने ‘‘न्याय वितरण का भविष्य: नवाचार, समावेश और ईमानदारी’’ विषय पर आयोजित व्याख्यान को संबोधित किया।
उन्होंने कहा कि न्याय में देरी केवल एक असुविधा नहीं, बल्कि अपने आप में अन्याय का ही एक रूप है।
न्यायमूर्ति पटेल ने कहा, ‘‘दुनिया भर में न्यायपालिकाएं मुकदमा प्रबंधन प्रणाली, ई-फ़ाइलिंग, ऑनलाइन सुनवाई, एआई की मदद से कानूनी अनुसंधान और मुकदमों की सुनवाई के लिए उत्पादक विश्लेषण जैसे तरीकों पर प्रयोग कर रही हैं। कुछ जगहों पर तो इससे भी आगे बढ़कर एआई टूल्स का इस्तेमाल किया जा रहा है। ये टूल्स ज़्यादा संख्या वाले, लेकिन कम पेचीदगी वाले मामलों में मदद तो करते हैं, लेकिन कभी भी न्यायिक सोच या फैसले लेने की प्रक्रिया की जगह नहीं लेते।’’
उन्होंने कहा, ‘‘मेरे अपने देश, जाम्बिया में, हम अदालती रिकॉर्ड को डिजिटल बनाने और ऑनलाइन गवाही की दिशा में धीरे-धीरे लेकिन सार्थक कदम उठा रहे हैं। महामारी के दौरान ज़रूरत की वजह से शुरू हुई ये पहल अब न्याय तक वास्तविक पहुंच के साधन के तौर पर पहचानी जा रही हैं।’’
इस कार्यक्रम को उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति वी. मोहना ने भी संबोधित किया।
भाषा धीरज सुरेश
सुरेश

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