गहलोत के बयान के मायने, राष्ट्रीय भूमिका का प्रयास या पायलट को रोकने की तरकीब

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गहलोत के बयान के मायने, राष्ट्रीय भूमिका का प्रयास या पायलट को रोकने की तरकीब

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  • Publish Date - June 8, 2026 / 11:25 PM IST,
    Updated On - June 8, 2026 / 11:25 PM IST

जयपुर, आठ जून (भाषा) राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के ताजा बयान को पार्टी आलाकमान को एक संदेश देने की कोशिश और सचिन पायलट की भविष्य की संभावित भूमिका को रोकने की कवायद के रूप में देखा जा रहा है, हालांकि पायलट ने इस विषय पर फिलहाल चुप्पी साधने का निर्णय लिया है।

सूत्रों का कहना है कि आने वाले दिनों में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (एआईसीसी) और कई प्रदेश कांग्रेस कमेटियों में बदलाव हो सकता है जिनमें राजस्थान भी शामिल है।

कांग्रेस नेतृत्व और राहुल गांधी के हालिया फैसलों के बाद यह चर्चा जोरों पर है कि निकट भविष्य में युवा नेताओं को पार्टी में महत्वपूर्ण भूमिकाएं दी जाएंगी।

ऐसे में यह चर्चा है कि राजस्थान के पूर्व उप मुख्यमंत्री पायलट को एक बार फिर प्रदेश कांग्रेस कमेटी की कमान मिल सकती है तथा वर्तमान अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा को पार्टी के राष्ट्रीय संगठन में भूमिका दी जा सकती है।

राजस्थान में वर्ष 2028 के आखिर में विधानसभा चुनाव संभावित है।

कांग्रेस संगठन में फेरबदल की इसी चर्चा के बीच गहलोत के बयान ने करीब साढ़े तीन साल पुराने उस प्रकरण को एक बार फिर सुर्खियों में ला दिया है जो कांग्रेस आलाकमान के लिए शर्मिंदगी का सबब बना था।

गहलोत ने रविवार को पहली बार विस्तार से 25 सितंबर, 2022 की कांग्रेस विधायक दल (सीएलपी) बैठक का जिक्र किया, जिसने उनके कांग्रेस अध्यक्ष बनने की संभावना और पायलट के मुख्यमंत्री बनने की अटकलों को पटरी से उतार दिया था।

गहलोत ने कहा कि 25 सितंबर 2022 को प्रदेश कांग्रेस में जो हुआ, वह पार्टी आलाकमान के खिलाफ विद्रोह नहीं था बल्कि विधायकों के बीच सचिन पायलट को मुख्यमंत्री बनाए जाने की संभावना पर असहमति थी।

जयपुर में 25 सितंबर 2022 को कांग्रेस विधायक दल की बैठक बुलाई गई थी ताकि इस पर चर्चा हो सके कि यदि अशोक गहलोत कांग्रेस अध्यक्ष चुने जाते हैं तो राजस्थान सरकार का नेतृत्व किसके हाथ में होगा। लेकिन गहलोत समर्थक विधायक इस बैठक में शामिल नहीं हुए और सचिन पायलट को मुख्यमंत्री बनाए जाने के किसी भी प्रयास का विरोध किया।

गहलोत ने रविवार को कहा कि वह कांग्रेस अध्यक्ष बनने की कतार में थे, लेकिन हालात ऐसे बने कि यह एक साजिश जैसी प्रतीत हुई और उनकी छवि खराब हो गई। उन्होंने यह भी बताया कि सीएलपी बैठक में प्रस्ताव पारित न हो पाने पर उन्होंने सोनिया गांधी से खेद व्यक्त किया।

वर्ष 2020 में पायलट ने गहलोत के खिलाफ बगावत किया था और उस समय उनको हटाकर गोविंद सिंह डोटासरा को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया था।

यह पहली बार है जब अशोक गहलोत ने सितंबर 2022 की घटना पर खुलकर बात की और इसे एक ‘साजिश’ बताया, जिसने उनकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाया और उन्हें कांग्रेस अध्यक्ष बनने का अवसर खोना पड़ा।

पार्टी सूत्रों ने कहा कि गहलोत खेमे की इच्छा नहीं है कि सचिन पायलट को भविष्य में कोई नेतृत्व वाली भूमिका मिले।

उन्होंने कहा, “जब भी संगठनात्मक बदलाव की चर्चा होती है, राज्य में नेतृत्व का सवाल फिर उठता है। गहलोत ने सितंबर 2022 की घटना को दोहराकर यह याद दिलाया है कि उस समय बड़ी संख्या में कांग्रेस विधायक पायलट के मुख्यमंत्री बनने के खिलाफ थे। इसका मतलब है कि राज्य में कई नेताओं को पायलट नेतृत्व की भूमिका में स्वीकार्य नहीं होंगे।”

गहलोत खेमे के नेताओं के अनुसार, पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के हालिया बयान का उद्देश्य उस गलत धारणा को दूर करना था कि 2022 की घटना की पटकथा गहलोत द्वारा मुख्यमंत्री पद बनाए रखने के लिए तैयार की गई थी।

एक नेता ने कहा, “सितंबर 2025 में जो हुआ, उसे पार्टी और कई लोगों ने गलत तरीके से लेते हुए यह समझा कि गहलोत मुख्यमंत्री पद छोड़ना नहीं चाहते और कांग्रेस अध्यक्ष बनना नहीं चाहते। घटनाक्रम को गलत तरीके से पेश किया गया, इसी कारण उन्होंने अब खुलकर इस पर बात की है।”

दूसरी ओर, पायलट के करीबी सूत्रों का कहना है कि पूर्व उपमुख्यमंत्री ने इस पूरे मामले में ‘गरिमापूर्ण चुप्पी’ बनाए रखने का विकल्प चुना है और इसके बजाय भाजपा को घेरने के लिए प्रश्नपत्र लीक और बढ़ती महंगाई पर ध्यान केंद्रित किया है।

पार्टी के कुछ नेताओं का मानना है कि अशोक गहलोत भविष्य में राष्ट्रीय भूमिका की ओर देख रहे हैं क्योंकि उन्होंने स्पष्ट किया कि 25 सितंबर 2022 की घटना सचिन पायलट के खिलाफ थी, न कि पार्टी हाईकमान के खिलाफ।

नेताओं ने बताया कि इससे पहले गहलोत के हमले मुख्य रूप से 2020 में पायलट की बगावत पर केंद्रित रहे थे। उस समय पायलट 18 अन्य कांग्रेस विधायकों के साथ गहलोत के खिलाफ खड़े हो गए थे और कथित तौर पर हरियाणा के मानेसर में ठहरे थे। इसने एक महीने तक जारी रहने वाला संकट पैदा हो गया था, जो अंततः पार्टी हाईकमान के हस्तक्षेप से समाप्त हुआ।

इस बगावत के परिणामस्वरूप पायलट ने उपमुख्यमंत्री और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष (पीसीसी चीफ) दोनों पद खो दिए।

गहलोत खेमे के एक विधायक और नेता ने कहा कि गहलोत की गांधी परिवार के प्रति निष्ठा सर्वविदित है और उन्हें किसी पद के लिए अपनी वफादारी साबित करने की आवश्यकता नहीं है।

उन्होंने कहा, “गहलोत लंबे समय से पार्टी के वफादार रहे हैं और दशकों से पार्टी के लिए मेहनत की है। उन्हें किसी भी पद के लिए अपनी निष्ठा साबित करने की आवश्यकता नहीं है। इसके विपरीत, जो सचिन पायलट ने किया, वह पार्टी के साथ विश्वासघात था और यही बात गहलोत और अन्य नेताओं को दुख देती है।”

सचिन पायलट खेमे से जुड़े नेताओं ने कहा कि अशोक गहलोत के हालिया बयान का समय बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि यह मुद्दा लगभग चार साल से शांत पड़ा था।

उनका मानना है कि गहलोत के बयान का उद्देश्य राजस्थान में पायलट की भूमिका बढ़ाने की किसी भी संभावना का विरोध करना और उसके खिलाफ माहौल तैयार करना है।

भाषा बाकोलिया हक संतोष

संतोष