ज्ञानेश कुमार के खिलाफ नोटिस में राहुल के असहमति नोट समेत कई बिंदुओं का उल्लेख

ज्ञानेश कुमार के खिलाफ नोटिस में राहुल के असहमति नोट समेत कई बिंदुओं का उल्लेख

ज्ञानेश कुमार के खिलाफ नोटिस में राहुल के असहमति नोट समेत कई बिंदुओं का उल्लेख
Modified Date: March 16, 2026 / 05:02 pm IST
Published Date: March 16, 2026 5:02 pm IST

नयी दिल्ली, 16 मार्च (भाषा) विपक्ष के एक नेता ने सोमवार को कहा कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने का प्रस्ताव लाने संबंधी नोटिस में नियुक्ति प्रक्रिया से लेकर राहुल गांधी पर उनके सार्वजनिक हमले और हाल के चुनावों में वोटों में कथित हेरफेर के मामलों का उल्लेख किया गया है।

बीते शुक्रवार को संसद के दोनों सदनों में प्रस्तुत किए गए नोटिस में कुमार को सीईसी के पद से हटाने का प्रस्ताव लाने की मांग की गई हैं। विपक्षी सांसदों ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) पर नाराजगी जताई है और कई मौकों पर मतदाता सूची में कथित हेरफेर पर चिंता जताई है।

विपक्षी नेता के अनुसार, लगभग 10 पृष्ठ वाले नोटिस में फरवरी, 2025 में राहुल गांधी द्वारा बतौर नेता प्रतिपक्ष प्रस्तुत एक असहमति नोट का जिक्र है। यह असहमति नोट ज्ञानेश कुमार को इस पद के लिए चुने जाने के खिलाफ दिया गया था। लोकसभा में विपक्ष के नेता गांधी सीईसी की नियुक्ति करने वाली समिति में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के साथ सदस्य हैं।

अपने असहमति नोट में राहुल गांधी ने कहा था, ‘‘नए सीईसी का चयन करने के लिए आधी रात को निर्णय लेना प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के लिए अपमानजनक है, जब समिति की संरचना और प्रक्रिया को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी जा रही है और 48 घंटे से भी कम समय में सुनवाई होनी है।’

नोटिस में अगस्त 2025 में एक संवाददाता सम्मेलन में सीईसी द्वारा गांधी को दिए गए सार्वजनिक अल्टीमेटम का भी जिक्र है। विपक्ष द्वारा ‘वोट चोरी’ के आरोपों के बीच, कुमार ने नेता प्रतिपक्ष से या तो माफी मांगने या अपने दावों के समर्थन में हस्ताक्षरित हलफनामा देने को कहा था।

नोटिस में कर्नाटक के अलंद और महादेवपुरा में विपक्षी दलों द्वारा उठाए गए मतदाता सूची में हेरफेर के आरोपों का भी जिक्र है।

नोटिस पर लोकसभा के लगभग 130 और राज्यसभा के 60 सदस्यों ने हस्ताक्षर किए हैं।

सूत्रों के अनुसार, नोटिस में कुमार के खिलाफ सात आरोप सूचीबद्ध हैं, जिनमें ‘‘पद पर रहते हुए पक्षपातपूर्ण आचरण’’, ‘चुनावी धोखाधड़ी की जांच में जानबूझकर बाधा डालना’ और बड़े पैमाने पर लोगों को ‘मताधिकार से वंचित करना’ शामिल हैं।

मुख्य निर्वाचन आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया महाभियोग है जो उच्चतम न्यायालय या उच्च न्यायालय के किसी न्यायाधीश को हटाने के लिए अपनाई जाती है। महाभियोग केवल साबित कदाचार या अक्षमता के आधार पर ही लगाया जा सकता है।

मुख्य निर्वाचन आयुक्त को पद से हटाने का प्रस्ताव संसद के किसी भी सदन में प्रस्तुत किया जा सकता है और इसे विशेष बहुमत से पारित करने की जरूरत होती है जिसमें सदन की कुल सदस्यता का बहुमत और उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई बहुमत आवश्यक होता है।

मुख्य निर्वाचन आयुक्त और निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति संबंधी कानून के अनुसार, मुख्य निर्वाचन आयुक्त को उसी तरीके और आधार पर पद से हटाया जा सकता है जिस पर सर्वोच्च न्यायालय के किसी न्यायाधीश को पद से हटाया जा सकता है।

न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 के अनुसार, यदि संसद के दोनों सदनों में प्रस्ताव की सूचना एक ही दिन दी जाती है, तो दोनों सदनों में प्रस्ताव स्वीकृत होने तक कोई समिति गठित नहीं की जाएगी।

दोनों सदनों में प्रस्ताव स्वीकार होने के बाद, लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति द्वारा संयुक्त रूप से एक समिति का गठन किया जाएगा।

इस समिति में प्रधान न्यायाधीश या सर्वोच्च न्यायालय के कोई न्यायाधीश, 25 उच्च न्यायालयों में से किसी एक के मुख्य न्यायाधीश और एक प्रतिष्ठित न्यायविद शामिल होंगे।

समिति की कार्यवाही किसी अदालती कार्यवाही की तरह होती है, जिसमें गवाहों और आरोपियों से जिरह की जाती है।

मुख्य निर्वाचन आयुक्त को भी समिति के समक्ष अपना पक्ष रखने का मौका मिलेगा।

भाषा हक हक वैभव

वैभव


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