‘द साइलेंट सिंडिकेट’: भारत के स्वास्थ्य क्षेत्र में विदेशी पूंजी की पड़ताल
‘द साइलेंट सिंडिकेट’: भारत के स्वास्थ्य क्षेत्र में विदेशी पूंजी की पड़ताल
नयी दिल्ली, 16 जुलाई (भाषा) ‘हैवी मेटल’ और ‘वैक्सीन नेशन’ जैसी किताबों के लिए जाने जाने वाले लेखक एवं पर्यावरणविद् अमीर शाहुल की नयी पुस्तक ‘द साइलेंट सिंडिकेट’ इस बात की गहराई से पड़ताल करती है कि कैसे वैश्विक पूंजी भारत के स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र को ‘बर्बाद’ कर रही है।
बाजार में 23 जुलाई को आने जा रही यह पुस्तक, भारत के स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में वैश्विक वित्तीय हितों की इस धीमी लेकिन शक्तिशाली ‘‘घुसपैठ’’ का पर्दाफाश करती है, ताकि इससे देश की स्वास्थ्य संप्रभुता पर मंडराने वाले दीर्घकालिक खतरों की पड़ताल की जा सके।
इसे ‘हैशेट इंडिया’ द्वारा प्रकाशित किया गया है।
प्रकाशक ने एक बयान में कहा, ‘‘यह पुस्तक भारतीय अस्पतालों में केवल विदेशी पूंजी के प्रवाह का कोई साधारण अध्ययन नहीं है, बल्कि खोजी पत्रकारिता का एक ऐसा उत्कृष्ट कार्य है जो एक अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्र के व्यापक बाजारीकरण को गहराई से उजागर करता है। यह पुस्तक एक शांत लेकिन गहरे वैचारिक बदलाव को रेखांकित करती है, जो हममें से हर एक व्यक्ति को प्रभावित करता है।’’
बयान में कहा गया, ‘‘अब स्वास्थ्य सेवा तंत्र के केंद्र में रोगी नहीं रहा-बल्कि पूंजी आ चुकी है।’’
पुस्तक में दावा किया गया है कि वैश्विक पूंजी से जुड़ी ब्लैकस्टोन, ब्लैकरॉक, केकेआर, कार्लाइल, टेमासेक और वैनगार्ड जैसी दिग्गज कंपनियाँ चुपचाप और तेजी से भारतीय अस्पतालों, फार्मा कंपनियों, बीमा कंपनियों और नैदानिक प्रयोगशालाओं को खरीद रही हैं।
इसमें कहा गया है कि भारत के स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र की रूपरेखा तेजी से न्यूयॉर्क, बोस्टन और लंदन जैसे वित्तीय केंद्रों में लिए गए फैसलों से तय हो रही है।
भाषा नेत्रपाल नरेश
नरेश

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