मप्र से झारखंड में स्थानांतरित किए जाने वाले 103 जानवरों में तीन बाघ और 50 जंगली भैंसा शामिल
मप्र से झारखंड में स्थानांतरित किए जाने वाले 103 जानवरों में तीन बाघ और 50 जंगली भैंसा शामिल
रांची, सात मार्च (भाषा) झारखंड वन विभाग को उम्मीद है कि मध्यप्रदेश से तीन बाघों, 50 जंगली भैंसों और 50 सांभर हिरणों को पलामू बाघ अभयारण्य में स्थानांतरित करने के उसके प्रस्ताव को इस महीने एनटीसीए की मंजूरी मिल जाएगी। इसकी ग्रीष्म ऋतु के बाद प्रक्रिया शुरू करने की योजना है।
इस संबंध में एक अधिकारी ने कहा कि इस स्थानांतरण का उद्देश्य बाघों और जंगली भैंसों की आबादी को बढ़ाना है, जो कभी लातेहार जिले के आरक्षित वन में बहुतायत में पाए जाते थे।
पलामू बाघ अभयारण्य (पीटीआर) के उपनिदेशक प्रजेश जेना ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ‘‘राज्य वन विभाग को राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) से अपने स्थानांतरण प्रस्ताव के लिए इस महीने मंजूरी मिलने की उम्मीद है।’’
उन्होंने बताया कि पीटीआर प्राधिकार ने जंगली जानवरों के स्थानांतरण के लिए मध्यप्रदेश सरकार के साथ एक समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर करने का प्रस्ताव भी प्रस्तुत किया है, जिसे एनटीसीए की मंजूरी मिलने के तुरंत बाद अंतिम रूप दे दिया जाएगा।
जेना ने कहा, ‘‘एनटीसीए द्वारा हमारे प्रस्ताव को मंजूर किए जाने के साथ ही मध्यप्रदेश सरकार के साथ एमओयू को अंतिम रूप मिल जाएगा। हमें उम्मीद है कि एनटीसीए की तकनीकी समिति की बैठक के बाद इस महीने हमारे प्रस्ताव को हरी झंडी मिल जाएगी।’’
उन्होंने कहा कि अधिकारियों ने पीटीआर में बाघों की आबादी बढ़ाने के लिए मध्यप्रदेश के वन अभयारण्यों से दो बाघिन और एक बाघ लाने का प्रस्ताव दिया है।
जेना ने कहा, ‘‘बाघों की पिछली अनुमान रिपोर्ट के अनुसार, मध्यप्रदेश में 785 बाघ थे, और इस बार वहां के नौ अभयारण्यों में यह संख्या 1,000 से अधिक हो सकती है।’’
वर्ष 2023 की अखिल भारतीय बाघ अनुमान (एआईटीई) रिपोर्ट के अनुसार, पलामू बाघ अभयारण्य में केवल एक बाघ था। हालांकि, पीटीआर प्राधिकार ने दावा किया कि तीन से चार बाघों की उपस्थिति के सबूत हैं।
झारखंड के पूर्व प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव) प्रदीप कुमार की 2016 की पुस्तक ‘मैं बाघ हूं’ के अनुसार, 1974 में ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ के तहत स्थापित 1,129 वर्ग किलोमीटर का पलामू बाघ अभयारण्य कभी बाघों की एक समृद्ध आबादी का निवास स्थान माना जाता था, जहां 1972 में 22 और 1995 में 71 बाघ थे।
पुस्तक के अनुसार, बाघों की आबादी 1997 में घटकर 44, 2002 में 34, 2010 में 10 और 2014 में तीन रह गई।
वर्ष 2018 की एआईटीई रिपोर्ट में झारखंड में बाघों की संख्या पांच बताई गई, लेकिन पीटीआर में किसी बाघ की मौजूदगी की बात नहीं कही गई।
जेना ने कहा कि मध्यप्रदेश से दो साल में चरणबद्ध तरीके से जंगली भैंसा और सांभर हिरण लाए जाएंगे, जहां 2,500 से अधिक जंगली भैंसा मौजूद हैं।
उन्होंने कहा, ‘‘ग्रीष्म ऋतु के बाद हम मध्यप्रदेश से बाघों और जंगली भैंसों को झारखंड में स्थानांतरित करना शुरू करेंगे। आरक्षित वन में एक बाड़ा बनाया जा रहा है, ताकि दूसरे राज्य से लाए गए जानवर झारखंड की जलवायु के अनुकूल हो सकें। इसके बाद उन्हें जंगल में छोड़ दिया जाएगा।’’
हाल में पीटीआर में किए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार, आरक्षित क्षेत्र में 68 जंगली भैंसा हैं, जिनमें 10 की उम्र 1.5 से 4 वर्ष है। इनमें से अधिकतर वर्तमान में छिपादोहर और बेतला क्षेत्रों में हैं।
सर्वेक्षण रिपोर्ट का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि 226 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में जंगली भैंसों की आबादी में गिरावट आई है, जिससे उनके संरक्षण को खतरा पैदा हो गया है।
श्रीवास्तव ने कहा कि झारखंड में जंगली भैंसों की घटती आबादी के प्रमुख कारण अवैध शिकार, संक्रमण और स्थानीय मवेशियों द्वारा आवास में व्यवधान उत्पन्न किया जाना है।
भाषा
नेत्रपाल दिलीप
दिलीप

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