राजस्‍थान के रणथंभौर में एकसाथ नजर आए बाघ, चीता और तेंदुआ, विशेषज्ञों ने बताया ‘दुलर्भ’

राजस्‍थान के रणथंभौर में एकसाथ नजर आए बाघ, चीता और तेंदुआ, विशेषज्ञों ने बताया 'दुलर्भ'

राजस्‍थान के रणथंभौर में एकसाथ नजर आए बाघ, चीता और तेंदुआ, विशेषज्ञों ने बताया ‘दुलर्भ’
Modified Date: April 21, 2026 / 05:01 pm IST
Published Date: April 21, 2026 5:01 pm IST

जयपुर, 21 अप्रैल (भाषा) राजस्थान में स्थित रणथंभौर बाघ अभयारण्य के एक पर्यटन क्षेत्र में दुनिया के तीन शिकारी जानवर – बाघ, तेंदुआ और चीता – एक ही समय पर एकसाथ देखे गए। विशेषज्ञों ने इसे ‘दुर्लभ’ और ‘वैज्ञानिक रूप से दिलचस्प’ करार दिया है।

मिली जानकारी के अनुसार यह अनूठा नजारा रविवार को अभयारण्य के जोन 9 में देखने को मिला। यह मुख्य दरवाजे से लगभग 45 मिनट की दूरी पर एक नदी के किनारे स्थित है।

रणथंभौर के उप वन संरक्षक मानस सिंह ने बताया कि ये तीनों शिकारी जानवर एक ही समय पर, एक-दो किलोमीटर के दायरे में एकसाथ देखे गए। इस नजारे ने पर्यटकों को रोमांचित कर दिया और वन्यजीव संरक्षकों का ध्यान आकर्षित किया।

वन विभाग ने इंस्टाग्राम पर लिखा, ‘जंगल ने हमें हैरान कर दिया। जोन 9 में जंगल एक बाघ, एक तेंदुआ और एक चीता – एक ही जगह पर, एक ही समय में एक साथ देखे गए।’

विभाग ने कहा, ‘ऐसे पल दुर्लभ होते हैं जिसके बारे में पहले सोचा भी नहीं जा सकता। ये हमें याद दिलाते हैं कि हमारे जंगल में क्‍या नहीं हो सकता है।’’ सिंह ने बताया कि जिस चीते को देखा गया उसका नाम केपी-2 है। यह मध्य प्रदेश के कूनो नेशनल पार्क से भटककर यहां आया है।

यह चीता पिछले हफ़्ते ही राजस्थान में दाखिल हुआ था। सिंह ने बताया कि रविवार को देखे जाने के बाद, यह चीता पार्क के जोन 8 की ओर चला गया।

रणथंभौर और कूनो नेशनल पार्क की एक विशेष संयुक्त टीम ने उस जगह पर अपना कैंप लगा लिया है। अधिकारी चीते की हरकतों पर चौबीसों घंटे नजर रखने के लिए आधुनिक ट्रैकिंग उपकरणों का इस्तेमाल कर रहे हैं।

वन्यजीव विशेषज्ञ राजकुमार चौहान ने बताया कि यह घटना इसलिए दिलचस्प है, क्योंकि ये तीनों ही जानवर शिकारी होने के बावजूद, जंगल में अलग-अलग तरह से रहते हैं और इनका पारिस्थितिक स्थान अलग-अलग होता है।

उन्होंने कहा, ‘तीन बड़े शिकारी जानवरों का इस तरह एक-दूसरे के इतने करीब होना – जबकि इन तीनों के रहने और शिकार करने के तरीके बिल्कुल अलग-अलग हैं – बेहद दुर्लभ घटना है।’

बाघ जंगल के सबसे ताकतवर और अकेले रहने वाले शिकारी होते हैं। वे अपने लिए बहुत बड़ा इलाका तय कर लेते हैं और अक्सर अपने मुख्य क्षेत्र में दूसरे शिकारी जानवरों को फटकने भी नहीं देते।

वहीं तेंदुए हालांकि किसी भी माहौल में ढल जाते हैं लेकिन वे आमतौर पर बाघों से सीधे टकराव से बचते हैं। वे अक्सर घने या ज्‍यादा ऊबड़-खाबड़ इलाकों में चले जाते हैं और अपनी दिनचर्या बदल लेते हैं; कई बार तो वे रात में ज्‍यादा सक्रिय हो जाते हैं।

इसके विपरीत चीते दिन में शिकार करने वाले जानवर हैं जो खुले घास के मैदानों को पसंद करते हैं और ताकत के बजाय अपनी गति पर निर्भर रहते हैं; इसी वजह से, घने जंगल और बाघों के वर्चस्व वाले इलाके उनके विचरण के कम मुफीद रहते हैं।

चौहान ने बताया कि एक ही समय और स्थान पर इन जानवरों के आमने-सामने आने की संभावना स्वाभाविक रूप से बहुत कम होती है। ऐसा इसलिए है क्योंकि वे ‘नीश पार्टिशनिंग’ प्रक्रिया के जरिए आपस की प्रतिस्पर्धा को कम कर लेते हैं। इस प्रक्रिया में, प्रतिस्पर्धी प्रजातियां अलग-अलग आवासों, संसाधनों और सक्रियता समय का इस्तेमाल करके प्रतिस्पर्धा को घटाती हैं और एक-दूसरे के साथ सह-अस्तित्व में रहती हैं जिससे जैव विविधता को बढ़ावा मिलता है।

उन्होंने कहा कि इस तरह का नजारा यह दर्शाता है कि इनका यह औचक या अस्‍थाई मिलना है। यह इनका किसी ‘छोटे इलाके’ में लंबे समय तक साथ रहने का संकेत नहीं है बल्कि यह शिकार की आवाजाही तथा इलाके की बनावट जैसे कारणों से हुआ अस्थायी मिलन है।

उल्‍लेखनीय है कि लगभग 1,800 वर्ग किलोमीटर के विशाल क्षेत्र में फैला रणथंभौर आघ अभयारण्य इस समय लगभग 70 बाघों का घर है। यह विशाल अभयारण्य राजस्थान के सवाई माधोपुर, धौलपुर और करौली जिलों तक फैला हुआ है। जैव विविधता से फले फूले इस अभयारण्य में अनुमानित स्तनधारियों की 38 प्रजातियां, पक्षियों की 315 प्रजातियां, सरीसृपों की 14 प्रजातियां और पौधों की 402 प्रजातिया पाई जाती हैं।

भाषा पृथ्‍वी अमित

अमित


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