अदालतें जांच पूरी करने के लिए जो समयसीमा तय करती हैं, वह नियम नहीं बल्कि अपवाद है: न्यायालय

अदालतें जांच पूरी करने के लिए जो समयसीमा तय करती हैं, वह नियम नहीं बल्कि अपवाद है: न्यायालय

अदालतें जांच पूरी करने के लिए जो समयसीमा तय करती हैं, वह नियम नहीं बल्कि अपवाद है: न्यायालय
Modified Date: January 3, 2026 / 02:30 pm IST
Published Date: January 3, 2026 2:30 pm IST

नयी दिल्ली, तीन जनवरी (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि अदालतें जांच एजेंसियों के लिए जांच पूरी करने को लेकर समयसीमा एहतियात के तौर पर नहीं, बल्कि तभी तय करती हैं जब जांच में बहुत ज्यादा देरी होने लगे और उससे लोगों को नुकसान होने का खतरा पैदा हो जाए।

न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन. के. सिंह की पीठ ने ये टिप्पणियां इलाहाबाद उच्च न्यायालय के एक आदेश पर गौर करते हुए कीं।

उच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश पुलिस को कथित रूप से दस्तावेजों में हेरफेर कर शस्त्र लाइसेंस प्राप्त करने के एक मामले में जांच पूरी करने के लिए 90 दिन का समय दिया था और आरोपी को किसी भी प्रकार की दंडात्मक कार्रवाई से संरक्षण प्रदान किया था।

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पीठ ने कहा, “संक्षेप में, समय-सीमाएं तब तय की जाती हैं जब देरी के कारण समस्या पैदा हो रही हो, न कि केवल इस आधार पर कि भविष्य में समस्या हो सकती है।

इसने शीर्ष अदालत के पिछले फैसलों का विश्लेषण करते हुए यह भी कहा कि “अदालतों ने लगातार यह माना है कि समयबद्ध जांच का निर्देश देना नियम नहीं, बल्कि अपवाद होना चाहिए।”

शीर्ष अदालत ने कहा, “इसी संवैधानिक परिप्रेक्ष्य में अदालतों ने उपयुक्त मामलों में हस्तक्षेप किया है, जहां जांच में देरी स्वयं ही पूर्वाग्रह या नुकसान का कारण बनने लगती है।”

इन टिप्पणियों के साथ उच्चतम न्यायालय ने उच्च न्यायालय के आदेश को निरस्त कर दिया।

भाषा जोहेब नेत्रपाल

नेत्रपाल


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