ट्रांस कार्यकर्ताओं ने प्रस्तावित ट्रांसजेंडर संशोधन विधेयक की आलोचना की, इसे ‘प्रतिगामी’ बताया
ट्रांस कार्यकर्ताओं ने प्रस्तावित ट्रांसजेंडर संशोधन विधेयक की आलोचना की, इसे ‘प्रतिगामी’ बताया
नयी दिल्ली, 15 मार्च (भाषा) ट्रांसजेंडर के अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठनों के कार्यकर्ताओं ने प्रस्तावित उभयलिंगी व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026 को लेकर कड़ी आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि यह संशोधन न केवल प्रतिगामी है, बल्कि इससे ट्रांसजेंडर समुदाय की पहचान, गरिमा और समानता जैसे मूल अधिकार भी कमजोर पड़ सकते हैं।
सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री वीरेंद्र कुमार ने शुक्रवार को यह संशोधन विधेयक पेश किया।
प्रस्तावित संशोधन को लेकर समुदाय के कई सदस्यों ने आलोचना की है। उनका कहना है कि यह कदम उस ऐतिहासिक फैसले में उच्चतम न्यायालय द्वारा तय किए गए मूल सिद्धांतों से भटकता है, जो राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण बनाम भारत सरकार में स्थापित किए गए थे।
ट्रांसजेंडर अधिकार कार्यकर्ता अक्कई पद्मशाली ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, “यह विधेयक बेहद मूर्खतापूर्ण और प्रतिगामी है। यह ट्रांसजेंडर समुदाय के खिलाफ है और किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं है।’’
पद्मशाली ने कहा कि प्रस्तावित प्रावधान ट्रांसजेंडर समुदाय को और अधिक हाशिये पर धकेल सकते हैं और ऐसी परिस्थितियां पैदा कर सकते हैं, जिनसे उनके प्रति सामाजिक कलंक और गहरा होगा।
उन्होंने कहा, “इस विधेयक की सबसे बड़ी समस्या यह है कि इससे ट्रांसजेंडर समुदाय और अधिक असुरक्षित हो जाएगा और ऐसा प्रतीत होता है मानो हमें संविधान के सामने फिर से अपराधी बना दिया जा रहा हो…”
पद्मशाली ने प्रस्तावित ढांचे में पहचानों की सीमित मान्यता पर भी आपत्ति जताई।
उन्होंने इस प्रावधान की भी आलोचना की कि लैंगिक पहचान तय करने का अधिकार चिकित्सा अधिकारियों को दिया जाए।
उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा, “हमारी पहचान का आकलन डॉक्टरों या मजिस्ट्रेटों द्वारा क्यों किया जाए? मैं इसे किसी भी तरह स्वीकार नहीं करती। हम इसके खिलाफ लड़ेंगे और अदालत में इसे चुनौती देंगे।”
कार्यकर्ता मीरा परिदा ने कहा कि प्रस्तावित संशोधन ट्रांसजेंडर समुदाय के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन कर सकते हैं और उनके सामने कई व्यावहारिक मुश्किलें खड़ी कर सकते हैं।
उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव संविधान के अनुरूप बिल्कुल नहीं है। यह हमारे निजता के अधिकार पर चोट करता है। जिस प्रावधान को इसमें जोड़ा जा रहा है, वह हमारे शरीर पर स्वायत्तता और गरिमा के साथ जीवन जीने के अधिकार को छीन लेता है-ऐसे अधिकार जिन्हें 2014 के राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण के फैसले में अदालत ने स्पष्ट रूप से मान्यता दी थी।”
परिदा ने कहा कि लैंगिक पहचान के सत्यापन से जुड़े प्रावधानों के कारण दस्तावेज हासिल करने और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंचने में गंभीर जटिलताएं पैदा हो सकती हैं।
उन्होंने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, “दस्तावेजों, अपनी पसंद के मुताबिक जीवन जीने और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच—इन सभी मामलों में यह विधेयक ट्रांस समुदाय के लिए कई कठिन परिस्थितियां पैदा कर सकता है। प्रस्तावित विधेयक की भाषा ट्रांसजेंडर लोगों को अपराधी की तरह पेश करती है…।’’
भाषा खारी प्रशांत
प्रशांत

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