तृणमूल अपना राजनीतिक आधार खो रही, भाजपा से मुकाबले के लिए हम अंग्रिम पंक्ति में: माकपा

तृणमूल अपना राजनीतिक आधार खो रही, भाजपा से मुकाबले के लिए हम अंग्रिम पंक्ति में: माकपा

तृणमूल अपना राजनीतिक आधार खो रही, भाजपा से मुकाबले के लिए हम अंग्रिम पंक्ति में: माकपा
Modified Date: May 23, 2026 / 01:00 pm IST
Published Date: May 23, 2026 1:00 pm IST

(अमिताव रॉय)

कोलकाता, 23 मई (भाषा) भीषण गर्मी के बीच पश्चिम बंगाल की सियासत में नयी तपिश महसूस की जा रही है, जहां मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) ने तृणमूल कांग्रेस पर कटाक्ष किया कि ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली यह पार्टी “तेजी से अपना आधार खो रही है’’ और ऐसे में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा)-शासित इस राज्य में माकपा अब खुद को तृणमूल के विकल्प के रूप में पेश करते हुए विपक्ष की राजनीतिक जमीन हासिल करने की उम्मीद जता रही है।

माकपा के पश्चिम बंगाल के महासचिव मोहम्मद सलीम ने दावा किया कि वामपंथी दल, खासकर माकपा, राज्य में अपने वैचारिक प्रतिद्वंद्वियों- राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और भाजपा से मुकाबले में पहले से ही ‘‘अग्रिम पंक्ति’’ में हैं।

सलीम ने कहा, ‘‘और अब चूंकि तृणमूल कांग्रेस बहुत तेजी से अपना आधार खो रही है, इसलिए हमारी जिम्मेदारी केवल सैद्धांतिक रूप से ही नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर भी पश्चिम बंगाल में भाजपा के खिलाफ मुख्य विपक्ष की भूमिका निभाने की है।’’

उन्होंने ‘पीटीआई-भाषा’ से खास बातचीत में कहा, ‘‘पश्चिम बंगाल में वाम पारिस्थितिकी तंत्र को पुनर्जीवित करना और लोगों के लोकतांत्रिक एवं संवैधानिक अधिकारों की लड़ाई में अग्रिम पंक्ति में रहना कठिन जरूर है, लेकिन असंभव नहीं।’’

सलीम ने दावा किया कि न केवल उनकी पार्टी, बल्कि पश्चिम बंगाल की जनता भी उम्मीद करती है कि माकपा-नीत वाम मोर्चा राज्य में तृणमूल कांग्रेस से विपक्ष की जगह ले लेगा।

उन्होंने कहा, ‘‘डेढ़ दशक से अधिक समय तक तृणमूल ने पुलिस और गुंडों की मदद से आतंक का राज कायम रखा, जिससे एक ऐसी खाई बन गई, जिसमें तृणमूल ने आरएसएस के लिए भीतरी इलाकों में खड़े होने के अनुकूल हालात बना दिए।’’

माकपा बार-बार तृणमूल कांग्रेस और भाजपा पर आरोप लगाती रही है कि दोनों दल पश्चिम बंगाल में धर्म की राजनीति के जरिये अपने बीच बनावटी ध्रुवीकरण पैदा कर रहे हैं, ताकि वाम दलों और अन्य विपक्षी पार्टियों को हाशिये पर रखा जा सके।

माकपा नेता ने कहा कि हाल के विधानसभा चुनावों में करारी हार के बाद ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस बिखर रही है और वामपंथी दल इस विपक्षी शून्य को भरेंगे।

तृणमूल प्रमुख ममता बनर्जी ने सिंगूर और नंदीग्राम में भूमि अधिग्रहण विरोधी आंदोलनों की लहर पर सवार होकर पश्चिम बंगाल में 34 वर्षों से लगातार सत्ता में रहे वाम मोर्चे को लगभग अकेले दम पर सत्ता से बेदखल कर दिया था।

विडंबना यह है कि 2026 के विधानसभा चुनाव अभियान में वाम और भाजपा दोनों के लिए औद्योगिकीकरण, बुनियादी ढांचा और रोजगार सृजन प्रमुख मुद्दे रहे। इसके अलावा कानून-व्यवस्था, महिला सुरक्षा, ‘सिंडिकेट’ राज और जबरन वसूली भी चुनावी मुद्दे बने।

माकपा नेता ने कहा कि वामपंथी दलों और मजदूर यूनियनों ने पहले से ही उन फेरीवालों के विस्थापन का मुद्दा उठाना शुरू कर दिया है, जिन्हें राज्य में भाजपा के सत्ता में आने के बाद से कई जगहों से बेदखल किया जा रहा है।

उन्होंने भाजपा पर सबसे गरीब लोगों की आजीविका पर हमला करने का आरोप लगाया।

सलीम ने कहा कि माकपा अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और पश्चिम बंगाल की सांस्कृतिक पहचान पर मंडरा रहे किसी भी खतरे तथा समाज में आपसी सौहार्द बनाए रखने के लिए संघर्ष जारी रखेगी।

पश्चिम बंगाल पर 1977 से 2011 तक शासन करने वाला माकपा-नीत वाम मोर्चा इस बार 2021 के विधानसभा चुनावों के बाद से चले आ रहे अपने चुनावी सूखे से उबरने में कामयाब रहा और एक सीट जीतने में सफल हुआ।

हालिया विधानसभा चुनाव में महज 4.45 प्रतिशत वोट मिलने के बावजूद माकपा खुद को कमजोर नहीं मानती। निर्वाचन आयोग के आंकड़ों के बावजूद पार्टी का कहना है कि वह पश्चिम बंगाल की राजनीति में अपनी भूमिका को फिर से मजबूत करने के लिए संघर्ष जारी रखेगी।

निर्वाचन आयोग के आंकड़ों के अनुसार, वाम मोर्चे के अन्य किसी भी घटक दल को इस चुनाव में एक भी प्रतिशत वोट नहीं मिले।

माकपा ने मुर्शिदाबाद जिले की डोमकल सीट जीती, जबकि वाम मोर्चे के अन्य घटक दल इस चुनाव में खाता भी नहीं खोल सके।

वाम मोर्चे को 2011 में 39 प्रतिशत वोट मिले थे, जिसमें अकेले माकपा की हिस्सेदारी 30 प्रतिशत थी। वर्ष 2021 के विधानसभा चुनावों में माकपा का वोट प्रतिशत गिरकर महज 4.73 प्रतिशत रह गया।

भाषा खारी सुरेश

सुरेश


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