तुर्कमान गेट हिंसा: दिल्ली की अदालत ने पांच आरोपियों की जमानत याचिका खारिज की
तुर्कमान गेट हिंसा: दिल्ली की अदालत ने पांच आरोपियों की जमानत याचिका खारिज की
नयी दिल्ली, 14 जनवरी (भाषा) दिल्ली की एक अदालत ने तुर्कमान गेट स्थित फैज-ए-इलाही मस्जिद के पास हुई पत्थरबाजी की घटना में आरोपी पांच लोगों की जमानत याचिका बुधवार को खारिज कर दी और कहा कि यह हिंसा केवल हमले का मामला नहीं बल्कि ‘प्रशासन पर हमला’ था।
न्यायिक मजिस्ट्रेट सायशा चड्ढा ने काशिफ, कैफ, अदनान, अरीब और समीर की जमानत याचिकाएं खारिज कर दीं और बचाव पक्ष द्वारा झूठे आरोप और प्राथमिकी दर्ज होने से पहले गिरफ्तारी के तर्कों को नकार दिया।
अदालत ने कहा, ‘बेरोकटोक पत्थरबाजी, सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाना और अपने आधिकारिक कर्तव्यों का निर्वहन करते समय पुलिस अधिकारियों को लगी चोटें वास्तव में केवल हमले का मामला नहीं है, बल्कि प्रशासन पर हमला है।’
अभियुक्तों के वकील ने तर्क दिया कि वे ‘एक-दूसरे को नहीं जानते हैं और उनका पहले कोई संबंध नहीं था।’’ उन्होंने यह दावा किया कि ‘दंगे जैसी स्थिति’ ‘पुलिस की विफलता’ थी और उन्हें फंसाया गया है।
बचाव पक्ष के वकील ने तर्क दिया कि प्राथमिकी दर्ज होने से पहले ही गिरफ्तारियां हो चुकी थीं और मामले को सत्र अदालत में विचारणीय बनाने के लिए भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 109(1) (हत्या का प्रयास) को गलत तरीके से लागू किया गया है।
अपने फैसले में, अदालत ने इस बात पर प्रकाश डाला कि सीसीटीवी कैमरों की फुटेज में काशिफ और कैफ की पहचान हुई, कॉल डिटेल रिकॉर्ड से अरीब की घटना स्थल पर मौजूदगी का पता चला, और अदनान और समीर के फोन से उत्तेजक रिकॉर्डिंग बरामद की गईं।
अदालत ने कहा, “रिकॉर्डिंग को खुली अदालत में सुना गया, जिसके अनुसार, आरोपियों को व्हाट्सऐप ग्रुप पर साथी सदस्यों को फैज-ए-इलाही मस्जिद के पास भीड़ लगाने के लिए उकसाते हुए सुना जा सकता है ताकि विध्वंस को रोका जा सके।’
इसमें कहा गया कि हत्या के प्रयास के अपराध को गलत तरीके से लागू किया गया था या नहीं, इसपर मुकदमे की सुनवाई के दौरान विचार किया जाएगा, लेकिन चिकित्सा कानूनी मामलों से पुलिस अधिकारियों के शरीर के महत्वपूर्ण अंगों पर चोटों का संकेत मिलता है।
मामले की डायरी का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि समय से पहले गिरफ्तारी के संबंध में दिए गए तर्क सही नहीं थे।
इसमें कहा गया है, ‘अत: आरोपों की गंभीरता और जांच के चरण को ध्यान में रखते हुए… अदालत आरोपियों की जमानत याचिकाएं खारिज करना उचित समझती है।’
भाषा नोमान प्रशांत
प्रशांत

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