पूर्व सांसद आनंद मोहन की समय-पूर्व रिहाई को चुनौती देने वाली याचिका पर फैसला सुरक्षित
पूर्व सांसद आनंद मोहन की समय-पूर्व रिहाई को चुनौती देने वाली याचिका पर फैसला सुरक्षित
नयी दिल्ली, 16 जुलाई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने बृहस्पतिवार को उस याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया, जिसमें बिहार सरकार द्वारा पूर्व सांसद आनंद मोहन को समय से पहले रिहा किए जाने के निर्णय को चुनौती दी गई है।
आनंद मोहन को वर्ष 1994 में गोपालगंज के तत्कालीन जिलाधिकारी जी. कृष्णैया की हत्या के मामले में आजीवन कारावास की सजा सुनायी गयी थी।
न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति शील नागू की पीठ ने याचिकाकर्ता एवं दिवंगत अधिकारी की पत्नी उमा कृष्णैया, बिहार सरकार, आनंद मोहन तथा राज्य सजा माफी बोर्ड की ओर से पेश वकीलों की दलीलें सुनीं।
सुनवाई के दौरान पीठ ने सवाल उठाया कि ड्यूटी पर तैनात एक लोकसेवक की हत्या को ‘दुर्लभतम’ मामला क्यों नहीं माना गया।
पीठ ने टिप्पणी की, ‘‘ऐसी टिप्पणियां अपराधियों को यह संदेश देंगी कि वे किसी लोकसेवक की हत्या करके भी बच निकलेंगे और अदालत इसे दुर्लभतम मामला नहीं मानेगी।’’
पीठ ने कहा, ‘‘हम हैरान हैं कि इससे अधिक ‘दुर्लभतम’ मामला और क्या हो सकता है?’’
इस मामले में निचली अदालत ने पांच अक्टूबर 2007 को आनंद मोहन को फांसी की सजा सुनाई थी। बाद में 10 दिसंबर 2008 को पटना उच्च न्यायालय ने इस सजा को बदलकर आजीवन कारावास कर दिया था।
उच्च न्यायालय के इस फैसले को जुलाई 2012 में उच्चतम न्यायालय ने भी बरकरार रखा था।
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ लूथरा ने दलील दी कि आनंद मोहन को पहले पैरोल पर रिहा किया गया था और राज्य सरकार को इस बारे में उच्चतम न्यायालय को निष्पक्षता के साथ जानकारी देनी चाहिए थी।
उन्होंने कहा, ‘‘क्या राज्य का यह दायित्व नहीं है कि वह इस अदालत को बताए कि दोषी कितने समय तक पैरोल पर रहा?’’
उन्होंने यह भी कहा कि मीडिया रिपोर्ट के अनुसार आनंद मोहन को तीन बार पैरोल दी गई थी।
लूथरा ने दलील दी कि सजा माफी बोर्ड ने सभी प्रासंगिक तथ्यों पर विचार नहीं किया।
बिहार सरकार की ओर से पेश वकील ने कहा कि आनंद मोहन वास्तविक रूप से 14 वर्ष से अधिक की सजा पूरी कर चुके हैं।
इस पर पीठ ने पूछा कि समयपूर्व रिहाई पर विचार करते समय क्या सजा माफी बोर्ड को आनंद मोहन के खिलाफ लंबित मामलों की जानकारी दी गई थी?
न्यायालय ने बिहार सरकार के वकील से कहा कि लूथरा की दलीलों के अनुसार आनंद मोहन को कम से कम तीन बार पैरोल दी गई थी।
पीठ ने पूछा, ‘‘राज्य सरकार हमें यह क्यों नहीं बता रही कि पैरोल किन-किन तारीखों को दी गई थी?’’
इस पर राज्य सरकार के वकील ने कहा कि वह पैरोल से संबंधित सभी विवरण अदालत के समक्ष प्रस्तुत करेंगे।
तेलंगाना से ताल्लुक रखने वाले कृष्णैया की 1994 में मुजफ्फरपुर जिले में भीड़ ने पीट-पीटकर हत्या कर दी थी। यह घटना उस वक्त हुई जब कृष्णैया की गाड़ी ने गैंगस्टर छोटन शुक्ला के अंतिम संस्कार के जुलूस को पार करने की कोशिश की। तत्कालीन विधायक आनंद मोहन इस जुलूस की अगुवाई कर रहे थे और उन पर आरोप था कि उन्होंने ही भीड़ को कृष्णैया की हत्या के लिए उकसाया था।
भाषा शफीक अविनाश
अविनाश

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