विहिप ने अनुसूचित जाति दर्जे पर न्यायालय के फैसले का स्वागत किया

विहिप ने अनुसूचित जाति दर्जे पर न्यायालय के फैसले का स्वागत किया

विहिप ने अनुसूचित जाति दर्जे पर न्यायालय के फैसले का स्वागत किया
Modified Date: March 25, 2026 / 04:26 pm IST
Published Date: March 25, 2026 4:26 pm IST

नयी दिल्ली, 25 मार्च (भाषा) विश्व हिंदू परिषद (विहिप) ने उच्चतम न्यायालय के उस फैसले का बुधवार को स्वागत किया जिसमें कहा गया है कि केवल हिंदू, सिख और बौद्धों को ही अनुसूचित जाति के रूप में मान्यता दी जा सकती है।

विहिप ने कहा कि यह फैसला संविधान की मूल भावना, सामाजिक न्याय और कानून के शासन को मजबूत करता है।

विश्व हिंदू परिषद के संयुक्त महासचिव सुरेंद्र जैन ने एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा कि यह फैसला संविधान की भावना के अनुरूप है। फैसले में कहा गया है कि केवल तीन समुदायों के व्यक्तियों को ही अनुसूचित जाति श्रेणी में माना जाएगा।

जैन ने कहा, ‘‘यह निर्णय देश में सामाजिक सद्भाव, पारदर्शिता और न्याय स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।’’

उन्होंने कहा कि विश्व हिंदू परिषद (विहिप) के कार्यकर्ता धर्म परिवर्तन कर चुके लोगों की सूची तैयार करेंगे और यह सुनिश्चित करेंगे कि ये अधिकार पात्र लोगों को मिलें।

उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को एक फैसले में कहा कि हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म के अलावा किसी अन्य धर्म को मानने वाले को अनुसूचित जाति (एससी) का सदस्य नहीं माना जा सकता।

उच्चतम न्यायालय ने आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के एक आदेश को बरकरार रखते हुए कहा कि अनुसूचित जाति (एससी) समुदाय से संबंधित व्यक्ति, किसी अन्य धर्म को अपनाकर एससी का दर्जा तुरंत और पूरी तरह खो देता है।

इस फैसले का हवाला देते हुए जैन ने कहा कि चूंकि कोई व्यक्ति अनुसूचित जाति (एससी) की संवैधानिक श्रेणी में नहीं आता, इसलिए वह अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत संरक्षण का दावा नहीं कर सकता।

विश्व हिंदू परिषद के नेता ने कहा, ‘‘अनुसूचित जातियों के अधिकारों और संरक्षण का उद्देश्य ऐतिहासिक सामाजिक अन्याय का समाधान करना है, विशेष रूप से हिंदू समाज की संरचना के भीतर के। इसलिए, जब कोई व्यक्ति स्वेच्छा से धर्म परिवर्तन करता है, तो वह उस सामाजिक संदर्भ से भी खुद को अलग कर लेता है जिस पर ये विशेष अधिकार आधारित हैं।’’

इस फैसले को ‘धर्मांतरण माफिया’ पर करारा प्रहार बताते हुए जैन ने आरोप लगाया कि कुछ समूह धर्मांतरण के बाद भी अपनी पिछली जातिगत पहचान के आधार पर संवैधानिक लाभ प्राप्त करने का प्रयास करते हैं।

जैन ने दावा किया, ‘‘जबकि ईसाई और मुस्लिम नेता दावा करते हैं कि उनके धर्म समतावादी हैं और जाति को मान्यता नहीं देते, वे साथ ही साथ आरक्षण लाभों की मांग के लिए ‘दलित ईसाई’ और ‘दलित मुस्लिम’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल करते हैं, जिससे धर्मांतरण के एजेंडे को बढ़ावा मिलता है।’’

भाषा अमित नरेश

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