उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन ने विकास, आदिवासी संस्कृति के संरक्षण के बीच संतुलन की वकालत की

उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन ने विकास, आदिवासी संस्कृति के संरक्षण के बीच संतुलन की वकालत की

उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन ने विकास, आदिवासी संस्कृति के संरक्षण के बीच संतुलन की वकालत की
Modified Date: September 9, 2026 / 06:58 pm IST
Published Date: September 9, 2026 6:58 pm IST

ईटानगर, नौ सितंबर (भाषा) उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने बुधवार को विकास और आदिवासी संस्कृति के संरक्षण के बीच संतुलन बनाने की वकालत की और कहा कि बदलाव मूल पहचान की कीमत पर नहीं होना चाहिए।

राधाकृष्णन ने अरुणाचल प्रदेश में न्यीशी समुदाय और अन्य जनजातीय समूहों की आस्था से जुड़े पूजा स्थल एवं सामुदायिक केंद्र न्येदार नामलो का दौरा करने के दौरान यह टिप्पणी की।

जनसभा को संबोधित करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि राज्य की अपनी पहली यात्रा के दौरान न्येदार नामलो आकर वह खुद को “धन्य” महसूस कर रहे हैं।

उन्होंने कहा, ‘‘आदिवासी संस्कृति का संरक्षण बदलाव का विरोध करना नहीं है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि बदलाव पहचान की कीमत पर न हो।’’

राधाकृष्णन ने अरुणाचल प्रदेश को ‘‘विविधता में एकता’’ का उदाहरण बताते हुए कहा कि यहां पारंपरिक मूल्य और आधुनिक आकांक्षाएं एक साथ देखी जा सकती हैं।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि प्रकृति, सत्य, सद्भाव और समुदाय पर जोर देने वाली आदिवासियों की डोन्यी-पोलो परंपरा आधुनिक युग में भी महत्वपूर्ण है।

राधाकृष्णन ने न्यीशी न्यीडुंग मुंग-ज्वंग रालुंग के प्रयासों की सराहना की। यह संगठन समुदाय की परंपराओं के दस्तावेजीकरण और शोध, सांस्कृतिक गतिविधियों एवं त्योहारों के आयोजन तथा प्रथागत कानूनों और सामाजिक मूल्यों के संरक्षण के लिए काम करता है।

उन्होंने कहा कि येरको स्वदेशी गुरुकुल प्रणाली इस बात का उदाहरण है कि किस तरह आधुनिक शिक्षा को पारंपरिक ज्ञान के साथ जोड़ा जा सकता है।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि इस तरह का दृष्टिकोण युवाओं को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहते हुए आधुनिक अवसरों का लाभ उठाने में मदद कर सकता है।

भाषा शफीक प्रशांत

प्रशांत


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