ऑपरेशन सिंदूर की अनकही कहानियों से रूबरू कराती विष्णु सोम की किताब

ऑपरेशन सिंदूर की अनकही कहानियों से रूबरू कराती विष्णु सोम की किताब

ऑपरेशन सिंदूर की अनकही कहानियों से रूबरू कराती विष्णु सोम की किताब
Modified Date: March 16, 2026 / 07:29 pm IST
Published Date: March 16, 2026 7:29 pm IST

नयी दिल्ली, 16 मार्च (भाषा) ऑपरेशन सिंदूर की अनकही कहानियों से रूबरू कराती एक किताब में अभियान की पहली रात तकनीकी चेतावनियों की परवाह न करते हुए एक सुखोई पायलट के उड़ान भरने से लेकर एक वरिष्ठ अधिकारी द्वारा लड़ाकू विमान के 27 वर्षीय पायलट को ब्रह्मोस मिसाइल का ‘‘ट्रिगर दबाने का निर्देश’’ दिए जाने तक का रोमांचक विवरण है।

सोमवार को इस किताब का विमोचन किया गया, जो 1971 के युद्ध के बाद से पाकिस्तान के अंदर भारतीय वायुसेना के हमलों के रोमांचक प्रत्यक्ष विवरण प्रदान करती है।

वरिष्ठ पत्रकार-लेखक विष्णु सोम द्वारा लिखित ‘द स्काई वॉरियर्स: ऑपरेशन सिंदूर अनवील्ड’ में भारतीय वायुसेना के उन अधिकारियों के अनकहे किस्से सामने लाए गए हैं, जो चार दिन तक चले संघर्ष के दौरान उच्च जोखिम वाले हवाई युद्ध में शामिल थे।

कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले में 26 निर्दोष नागरिकों की मौत के बाद भारत ने छह मई 2025 की देर रात पाकिस्तान और इसके कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) में स्थित नौ आतंकी शिविरों पर मिसाइल हमलों की शुरुआत की थी, जिसमें कम से कम 100 आतंकवादी मारे गए थे।

किताब पाठकों को कॉकपिट के भीतर के घटनाक्रम से रूबरू कराती है और उन अनसुनी कहानियों को बताती है कि कैसे भारतीय वायुसेना के पायलटों ने न केवल दुश्मन से बल्कि तकनीकी गड़बड़ियों और पल भर की दुविधाओं से भी मुकाबला किया।

किताब के मुताबिक, ऐसा ही एक क्षण छह मई की देर रात आया जब ग्रुप कैप्टन कुणाल कालरा ने अपने सुखोई-30 एमकेआई विमान से पाकिस्तान स्थित लक्ष्य को भेदने के लिए उड़ान भरी और आकाशीय बिजली, हलचल की स्थिति और बारिश वाले बादलों को चीरते हुए रास्ता बनाया।

कालरा ने किताब में याद किया, ‘‘वहां बहुत बादल थे और हमारे पास रास्ता बदलने का कोई मौका नहीं था क्योंकि इससे दुश्मन को हमारे उड़ान मार्ग की जानकारी मिल जाती। इसलिए हमने अपने मौजूदा मार्ग पर ही उड़ान जारी रखी और कुछ हद तक खराब मौसम को भेदते हुए आगे बढ़े।’’

उन्होंने बताया कि भारतीय लड़ाकू विमानों के सीमा पार स्थित लक्ष्यों की ओर बढ़ने के दौरान, विमान समूह ने पूर्णतः रेडियो संपर्क बनाए रखा।

कालरा के मुताबिक, पहली तकनीकी समस्या तब सामने आई जब कॉकपिट में अचानक एक लाल ‘मास्टर वार्निंग लाइट’ चमक उठी और एक स्वचालित चेतावनी आवाज ने विमान में विद्युत प्रणाली की खराबी का संकेत दिया।

सामान्य परिस्थितियों में, ऐसी चेतावनी मिलने पर पायलट को मिशन रद्द करके हवाई ठिकाने पर वापस लौटना पड़ता, लेकिन कालरा ने आगे बढ़ने का विकल्प चुना।

उन्होंने कहा, ‘‘यह जानते हुए कि विमान अस्त्र दागने में सक्षम है, मैंने अपने सामने आने वाली चुनौतियों के बावजूद हथियार दागने का फैसला किया।’’

कालरा ने बताया कि खतरे का माहौल बेहद गंभीर था, पाकिस्तानी रडार सक्रिय थे और दुश्मन की मिसाइलें बिना किसी पूर्व सूचना के आ सकती थीं।

उन्होंने कहा, ‘‘अगर आपकी तरफ कोई मिसाइल दागी जाती है, तो आपको सिर्फ वे बिंदु दिखाई देंगे जो रात में चमकते हैं और बहुत तेजी से आकार में बढ़ते हैं। प्रतिक्रिया करने के बारे में सोचने से पहले ही वे सीधे आपकी ओर आ जाते हैं।’’

कालरा ने बताया कि तकनीक खराबी और खराब मौसम के बावजूद, वह अस्त्र दागने के लिए निर्धारित बिंदु पर पहुंच गए तथा तभी उनके कॉकपिट में लगे ‘हेड-अप डिस्प्ले’ पर ‘लॉन्च’ शब्द चमका। कालरा ने इस निर्देश पर त्वरित प्रतिक्रिया करते हुए ‘ट्रिगर’ दबा दिया।

ग्रुप कैप्टन ने यादा किया, ‘‘जब मिसाइल दागी जाती है, तो नारंगी रंग की रोशनी निकलती है, आसमान जगमगा उठता है। रात अंधेरी थी, लेकिन अब अंधेरा नहीं रहा। और आपको पता चल जाता है कि यह मिसाइल कुछ नुकसान पहुंचाने वाली है और राष्ट्र की उम्मीदें इसी पर टिकी हैं।’’

लेकिन पहला अस्त्र दागने के बाद भी कालरा की चुनौतियां खत्म नहीं हुई थीं। उनके विमान में जल्द ही एक और समस्या उत्पन्न हो गई – इस बार उनकी दूसरी मिसाइल को नियंत्रित करने वाली हथियार प्रणाली में दिक्कत आ गई।

उन्होंने कहा, ‘‘मेरी पूरी टुकड़ी ने अस्त्र दागने का अपना काम कर दिया था और मैं अकेला रह गया था, क्योंकि मैं कुछ समस्याओं से निपट रहा था। अगर दुश्मन मेरे विमान को लक्षित कर लेता, तो निश्चित रूप से मिसाइल दागी जाती।’’

कालरा ने बताया कि समय तेजी से बीत रहा था और दुश्मन के रडार द्वारा उनके सुखोई विमान को ट्रैक किए जाने का खतरा बढ़ रहा था, ऐसे में प्रणाली को ‘रीसेट’ करने का सोच-समझकर निर्णय लिया।

उन्होंने कहा, ‘‘अगर मैं पांच मिनट में मिसाइल दागने में सक्षम होता, तो मैं दाग देता। अगर यह समयसीमा पूरी नहीं होती, तो निश्चित रूप से मुझे किसी और दिन उड़ान भरने के लिए वापस आना पड़ता।’’

किताब के मुताबिक, यह दांव कारगर साबित हुआ। प्रणाली सफलतापूर्वक ‘रीसेट’ हो गई और कालरा ने अपने विमान को शत्रु के हवाई क्षेत्र से दूर मोड़ने से पहले दूसरी मिसाइल दागने में कामयाबी हासिल कर ली।

कुछ दिन बाद, ऑपरेशन सिंदूर के अंतिम चरण के दौरान जब भारतीय वायुसेना पाकिस्तानी सैन्य विमानन के प्रमुख ठिकानों को निशाना बना रही थी, तब एक अन्य सुखोई-30 एमकेआई पायलट को निशाना साधने का मौका मिला।

ग्रुप कैप्टन मानव भाटिया राफेल लड़ाकू विमान के साथ उड़ान भरने वाली स्क्वाड्रनों में से एक का नेतृत्व कर रहे थे। उनका विमान सुपरसोनिक ब्रह्मोस मिसाइल से लैस था।

आगे वाले कॉकपिट में स्क्वाड्रन के सबसे युवा पायलटों में से एक बैठा था। वह 27 वर्षीय लड़ाकू विमान पायलट था जिसने ब्रीफिंग के दौरान कई बार मिशन का पूर्वाभ्यास किया था।

पाकिस्तानी रडार प्रणालियों की सक्रियता के बीच विमान अंधेरे और सख्त रेडियो चुप्पी में उड़ान भर रहा था।

भाटिया ने याद किया, ‘‘अंधेरा छाया हुआ था। पश्चिम से दिखने वाली हर रोशनी को देखकर मन में सवाल उठता था, ‘क्या यह सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल है?’ हम आगे और पीछे के कॉकपिट के बीच बात कर रहे थे – ‘यह क्या है?’ ‘नहीं, यह कुछ नहीं है, यह एक तारा है।’’

दो दशकों की सेवा का अनुभव रखने वाले अनुभवी पायलट भाटिया ने पहले ही तय कर लिया था कि समय आने पर युवा पायलट ही मिसाइल दागेगा।

उन्होंने कहा, ‘‘मैंने 20 साल सेवा की थी। अब मैं अपने बगल में बैठे युवक को मिसाइल दागने का रोमांच देना चाहता था।’’

भाटिया ने कहा, ‘‘जैसे ही सुखोई अपने लक्ष्य के नजदीक पहुंचा, मैंने मिसाइल दागने का निर्देश दिया और कुछ ही क्षणों में ब्रह्मोस मिसाइल विमान से अलग होकर लक्ष्य को भेदने के लिए रवाना हो गई।’’

उन्होंने कहा, ‘‘मैंने मन ही मन प्रार्थना की, बस, एकदम सटीक निशाना लगा दो यार, मिसाइल का प्रक्षेपण और निशाना एकदम सही हो। और फिर – गई! मिसाइल चली गई! मैंने इंटरकॉम पर कहा, ‘‘बहुत बढ़िया’’।

भाटिया ने कहा कि वे घटनाएं अब भी उनके मन में ताजा हैं।

भाषा धीरज नेत्रपाल

नेत्रपाल


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