क्या आप आपत्ति का इंतजार कर रहे थे: कलकत्ता उच्च न्यायालय ने नेता प्रतिपक्ष मामले में सवाल किए

क्या आप आपत्ति का इंतजार कर रहे थे: कलकत्ता उच्च न्यायालय ने नेता प्रतिपक्ष मामले में सवाल किए

क्या आप आपत्ति का इंतजार कर रहे थे: कलकत्ता उच्च न्यायालय ने नेता प्रतिपक्ष मामले में सवाल किए
Modified Date: June 18, 2026 / 12:30 am IST
Published Date: June 18, 2026 12:30 am IST

कोलकाता, 17 जून (भाषा) कलकत्ता उच्च न्यायालय ने बुधवार को विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष की नियुक्ति की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब एक ही राजनीतिक दल की ओर से दो परस्पर अलग अलग प्रस्ताव मिले, तो विधानसभा अध्यक्ष ने किस आधार पर निर्णय लिया।

अदालत पश्चिम बंगाल के विधायी इतिहास में पहली बार सामने आए ऐसे विवाद की सुनवाई कर रही थी। शोभनदेब चट्टोपाध्याय ने एक रिट याचिका दायर कर उनके नाम को खारिज किए जाने और पार्टी के दूसरे विधायक रीताब्रता बनर्जी को विपक्ष का नेता नियुक्त किए जाने को चुनौती दी है।

विधानसभा अध्यक्ष की ओर से पेश वकील बिल्वदल भट्टाचार्य की दलील पर न्यायमूर्ति कृष्णा राव ने टिप्पणी की कि जब अध्यक्ष को दो अलग-अलग प्रस्ताव प्राप्त हुए थे, तो वह “बिना सदन में बहुमत साबित कराए अपने कक्ष में बैठे बैठे यह कैसे तय कर सकते थे कि कौन-सा प्रस्ताव सही है और कौन-सा गलत?”

न्यायाधीश ने अध्यक्ष के वकील से पूछा, “दो बागी विधायकों की शिकायत 27 मई को अध्यक्ष के पास आई, जबकि पार्टी की ओर से शोभनदेब चट्टोपाध्याय को विपक्ष का नेता बनाने का पत्र 20 मई को भेजा गया था। तो क्या आपत्ति आने का इंतजार किया जा रहा था?”

अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ताओं की आपत्ति केवल इस बात को लेकर है कि अध्यक्ष ने पार्टी के प्रस्ताव को नजरअंदाज करते हुए किसी अन्य व्यक्ति को विपक्ष का नेता कैसे नियुक्त कर दिया। अदालत ने ऐसी असाधारण परिस्थितियों में अध्यक्ष के कर्तव्यों और अधिकारों को लेकर स्पष्टता मांगी।

अदालत ने कहा, “मैं मानता हूं कि हस्ताक्षरों में कथित असमानता आदि को लेकर उनके दावे विवादित हैं। लेकिन सही या गलत, अध्यक्ष को 9 मई को एक प्रस्ताव मिला था और फिर 20 मई को पार्टी की बैठक के प्रस्ताव (रिजोल्यूशन) की प्रति भी प्राप्त हुई। फिर वह चुप क्यों रहे? मान लिया कि विवाद था, लेकिन यह विवाद तो 27 मई को सामने आया। ऐसे में विपक्ष के नेता की नियुक्ति किस प्रस्ताव के आधार पर की गई?”

अदालत की यह टिप्पणी विधानसभा अध्यक्ष द्वारा विपक्ष के नेता की नियुक्ति की प्रक्रिया और उनके निर्णय लेने के अधिकारों पर उठे सवालों के संदर्भ में आई।

भाषा सुरभि प्रशांत

प्रशांत


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