जब कृष्णमूर्ति ने महेश भट्ट की व्हिस्की की तलब के लिए बीच में ही सत्संग समाप्त किया
जब कृष्णमूर्ति ने महेश भट्ट की व्हिस्की की तलब के लिए बीच में ही सत्संग समाप्त किया
नयी दिल्ली, 28 मई (भाषा) दार्शनिक एवं गुरु यू.जी. कृष्णमूर्ति ने बेंगलुरु में 1980 के दशक में अपना सत्संग अचानक बीच में ही रोक दिया था। सत्संग को बीच में रोकने की वजह बेहद अजीब थी, जिसके कारण उनके अनुयायी हैरान हो गए थे।
दरअसल, वहां मौजूद महेश भट्ट का ध्यान बुरी तरह भटक रहा था और वह ‘ब्लैक लेबल’ व्हिस्की के लिए तड़प रहे थे। कृष्णमूर्ति ने दो-टूक कहा कि उन्हें उनके (भट्ट) इस ‘नशे’ का इंतजाम करना ही होगा।
जब कमरे में मौजूद साधक मौन, पवित्रता और ‘मोक्ष’ पर बहस कर रहे थे, तब भट्ट कहीं अधिक सांसारिक लालसा से व्याकुल थे।
फिल्म निर्माता भट्ट अपनी नई किताब ‘द एशेज आर वार्म: मेमोरीज ऑफ ए लाइफटाइम स्पेंट विद यूजी कृष्णमूर्ति’ में यह बात याद करते हैं।
यह पुस्तक, भट्ट और लेखिका सुनीता पंत बंसल के बीच हुई बातचीत पर आधारित है और इसमें फिल्म निर्माता और उस दार्शनिक के बीच के संबंधों का बेहद निजी वर्णन है, जिन्हें अक्सर परंपरा विरोधी कहा जाता है। इसमें उस असामान्य घटना का विस्तृत विवरण दिया गया है।
होटल व्हिस्की की बोतल का इंतज़ाम करने में नाकाम रहा था और भट्ट इसके बारे में सोचना बंद नहीं कर पा रहे थे। कृष्णमूर्ति अचानक सत्र के बीच में ही रुक गए और भट्ट की ओर मुड़कर बोले, ‘आप यहां नहीं हैं।’
77 वर्षीय भट्ट ने स्वीकार किया कि उनका मन होटल में ही अटका हुआ था, जहां उन्हें बोतल नहीं मिलने के कारण होटल के कर्मचारियों पर गुस्सा आ रहा था।
पुस्तक में कृष्णमूर्ति के हवाले से कहा गया है, ‘चिंता मत करो। अगर वे इसे नहीं ला सकते, तो मैं तुम्हें वह स्कॉच दिला दूंगा जिसकी तुम्हें तलब है।’
भट्ट के कबूलनामे ने सभा में मौजूद लोगों को चौंका दिया, खासकर उस व्यक्ति को जिसे केवल ‘ब्रह्मचारी’ के नाम से संबोधित किया गया था और जो कभी कर्नाटक के एक प्रतिष्ठित मठ का नेतृत्व करने की दौड़ में शामिल था। लेकिन यूजी ने आक्रोश के बजाय हास्यबोध के साथ जवाब दिया।
जैसे-जैसे शाम ढलती गई और भट्ट की तलब बढ़ती गई तो कृष्णमूर्ति ने सत्संग को समय से पहले ही समाप्त कर दिया।
495 रुपये की कीमत वाली और रूपा द्वारा प्रकाशित पुस्तक ‘द एशेज आर वार्म…’ भट्ट के निजी नोट्स का संग्रह है जिसमें उन्होंने अपनी और कृष्णमूर्ति की यादों को ‘पूरी ईमानदारी’ के साथ बयान किया है।
भाषा तान्या नरेश
नरेश

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