पत्नी की उच्च शिक्षा भरण-पोषण देने से इनकार करने का आधार नहीं हो सकती: इलाहाबाद उच्च न्यायालय

पत्नी की उच्च शिक्षा भरण-पोषण देने से इनकार करने का आधार नहीं हो सकती: इलाहाबाद उच्च न्यायालय

पत्नी की उच्च शिक्षा भरण-पोषण देने से इनकार करने का आधार नहीं हो सकती: इलाहाबाद उच्च न्यायालय
Modified Date: January 13, 2026 / 12:23 am IST
Published Date: January 13, 2026 12:23 am IST

प्रयागराज, 12 जनवरी (भाषा) इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा है कि पत्नी का अधिक शिक्षित होना या उसके पास व्यावसायिक कौशल होना मात्र दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 125 के तहत उसे भरण-पोषण से वंचित करने का आधार नहीं हो सकता।

पति से भरण-पोषण की मांग संबंधी महिला की अर्जी खारिज करने वाले परिवार न्यायालय के आदेश को निरस्त करते हुए न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद ने कहा, “पति का केवल पत्नी की योग्यता को आधार बनाकर अपनी कानूनी जिम्मेदारी से बचना अनुचित है।”

अदालत ने कहा कि पत्नी की कमाने की मात्र संभावना वास्तविक लाभकारी रोजगार से अलग है।

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उसने कहा कि यह ऐसी वास्तविकता है, जिसका सामना कई महिलाएं करती हैं, जिनके लिए शिक्षित होने के बावजूद वर्षों तक घरेलू जिम्मेदारियों और बच्चों की देखभाल के बाद कार्यबल में शामिल होना कठिन होता है।

अदालत ने बुलंदशहर परिवार न्यायालय के अपर प्रधान न्यायाधीश के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें सीआरपीसी की धारा 125 के तहत पति से भरण-पोषण की मांग वाली पत्नी की अर्जी खारिज कर दी गई थी।

परिवार न्यायालय ने पत्नी की भरण-पोषण संबंधी मांग यह कहते हुए खारिज कर दी थी कि उसने अदालत से अपनी पेशेवर शिक्षा छिपाई।

परिवार अदालत ने यह भी कहा था कि पत्नी पर्याप्त कारण के बिना अलग रह रही है और हिंदू विवाह अधिनियम की धारा नौ के तहत कार्यवाही के बावजूद उसने ससुराल वापस आने से मना कर दिया। हालांकि परिवार अदालत ने महिला के बेटे को 3,000 रुपये प्रति माह गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया था।

उच्च न्यायालय में महिला के वकील ने दलील दी कि महिला के पास आय का कोई स्रोत नहीं है और उसका पति ऐसा कोई साक्ष्य देने में विफल रहा है जो दर्शाता हो कि उसकी पत्नी कामकाजी है और आय अर्जित कर रही है।

हालांकि, पति ने दलील दी कि उसकी पत्नी अत्यधिक योग्य है और वर्तमान में एक निजी अध्यापक के तौर पर काम कर रही है और उसके पास सिलाई कढ़ाई में आईटीआई डिप्लोमा है। वह बच्चों को ट्यूशन पढ़ाकर भी आय अर्जित करती है।

अदालत ने पाया कि महिला ने ससुराल में दुर्व्यवहार के कारण घर छोड़ा और उसके रोजगार के संबंध में कोई विशेष साक्ष्य भी नहीं है। अदालत ने कहा कि पति से गुजारा भत्ता प्राप्त करने के पत्नी के संवैधानिक अधिकार का इस आधार पर उल्लंघन नहीं किया जा सकता कि उसकी कमाने की क्षमता है।

अदालत ने पांच जनवरी को दिए अपने आदेश में कहा, ‘‘यह सामाजिक हकीकत का मामला है कि महिलाएं खुद को घरेलू जिम्मेदारियों और बच्चों की देखभाल करने में समर्पित कर देती हैं और लाभप्रद रोजगार पाने में असमर्थ होती हैं।’’

अदालत ने महिला के बच्चे को 3,000 रुपये गुजारा भत्ता की राशि को बहुत कम करार देते हुए कहा कि बच्चे को पढ़ाई और एक स्वस्थ वातावरण में बढ़ने के लिए सहयोग की जरूरत होती है।

इस प्रकार से, अदालत ने इस मामले को बुलंदशहर की परिवार अदालत के पास भेजकर एक महीने के भीतर इस पर नए सिरे से उचित आदेश पारित करने को कहा।

भाषा सं राजेंद्र सिम्मी

सिम्मी


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