कम पहचान रखने वाले कलाकारों की कृतियां भी अधिक कीमत में बिक रहीं

कम पहचान रखने वाले कलाकारों की कृतियां भी अधिक कीमत में बिक रहीं

कम पहचान रखने वाले कलाकारों की कृतियां भी अधिक कीमत में बिक रहीं
Modified Date: August 23, 2026 / 03:01 pm IST
Published Date: August 23, 2026 3:01 pm IST

नयी दिल्ली, 23 अगस्त (भाषा) अमृता शेर-गिल की पेंटिंग ‘द स्टोरीटेलर’ 2023 में 61.8 करोड़ रुपये में बिकी थी और यह किसी भारतीय कलाकार के लिए विश्व रिकॉर्ड था। इसके बाद 2025 में एम.एफ. हुसैन की ‘ग्राम यात्रा’ 118 करोड़ रुपये में बिकी और 2026 में राजा रवि वर्मा की कलाकृति ‘यशोदा और कृष्ण’ की नीलामी 167.2 करोड़ रुपये में हुई।

ऐसा लगता है कि हर साल इस तरह के नए रिकॉर्ड बन रहे हैं। अगर बड़े कलाकारों की पेंटिंग की कीमतें चौंकाने वाली हैं, तो कम मशहूर कलाकारों की पेंटिंग की कीमतें भी कम नहीं हैं। उदाहरण के लिए, असित कुमार हलदर की ‘मदर इंडिया’ (बंगाल का विभाजन) को लें, जो लगभग 8-12 लाख रुपये के अनुमान के मुकाबले 2.07 करोड़ रुपये में बिकी – यानी अपने अनुमान से 25 गुना ज़्यादा।

इसी तरह शांति दवे की बिना शीर्षक वाली पेंटिंग (1971) को लें तो वह लगभग 32-45 लाख रुपये के अनुमान के मुकाबले 3.25 करोड़ रुपये में बिकी।

ऐसी बिक्री ने भारतीय कलाकारों के लिए एक चलन बना दिया है। पत्रिका ‘लक्सट्रोप’ के अनुसार, यह बाजार लगभग 3,000 करोड़ रुपये का है, जो सदी की शुरुआत में कुछ करोड़ रुपये ही था।

यह सब दिखाता है कि भारतीय कला का दायरा सिर्फ़ कुछ महंगे सौदों से कहीं आगे बढ़ रहा है। यह विकास की कहानी भले ही कुछ चुनिंदा महान आधुनिकतावादी कलाकारों के इर्द-गिर्द घूमती दिखती हो, लेकिन इसे नए और जानकार खरीदारों की वजह से कलाकृति संग्रह करने वालों (कलेक्टर्स) की संख्या बढ़ने, भारत के भीतर खरीदारों की भागीदारी बढ़ने और अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनियों, संग्रहालयों व संस्थानों में देश की बढ़ती मौजूदगी से बढ़ावा मिला है।

सैफ्रनआर्ट ऑक्शन हाउस के सह-संस्थापक और सीईओ दिनेश वजीरानी के अनुसार, कीमतों में इस उछाल की वजह ‘‘बेहतरीन कलाकृतियों का एक हिस्सा’’ पाने की चाहत है।

आस्टागुरु ऑक्शन हाउस के विपणन निदेशक मनोज मनसुखानी ने कहा, ‘‘भारतीय कला में फिर से जगी दिलचस्पी का सीधा संबंध भारत के आधुनिकतावादी आंदोलन को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मिल रही पहचान से है। भारतीय संग्रहकर्ताओं की नई पीढ़ी में भी आधुनिकतावादी कलाकारों की कलाकृतियों को खरीदने की इच्छा बढ़ी है, क्योंकि भारत की कला की कहानी में इन कलाकारों की अहम भूमिका है।’’

मनसुखानी ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ‘‘साथ ही, अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने दक्षिण एशियाई कला को प्रदर्शनियों, संग्रहों और शोध कार्यक्रमों में तेज़ी से शामिल किया है। इससे भारतीय आधुनिकतावाद को क्षेत्रीय नजरिए के बजाय वैश्विक संदर्भ में नई पहचान मिली है।’’

आधुनिक और समकालीन कलाकारों के बीच का फर्क कुछ हद तक समय और कुछ हद तक सोच पर आधारित है। आधुनिकतावादी कलाकार आम तौर पर वे थे जो 19वीं सदी के आखिर से लेकर 1980 के दशक की शुरुआत तक सक्रिय रहे। उन्होंने पारंपरिक कला शैलियों से हटकर नए रूपों, अमूर्त कला (एब्स्ट्रैक्शन) और व्यक्तिगत अभिव्यक्ति के साथ प्रयोग किए।

1980 के दशक के बाद सक्रिय समकालीन कलाकारों की पहचान किसी एक शैली से नहीं, बल्कि मौजूदा सामाजिक, राजनीतिक, तकनीकी और पर्यावरणीय मुद्दों से उनके जुड़ाव से होती है।

हाल के वर्षों में, नलिनी मलानी, नसरीन मोहम्मदी और भूपेन खक्कर समेत कई भारतीय कलाकारों की कलाकृतियों को म्यूज़ियम ऑफ़ मॉडर्न आर्ट, टेट मॉडर्न, विक्टोरिया एंड अल्बर्ट म्यूज़ियम जैसे मशहूर संग्रहालयों और संस्थाओं में प्रदर्शित किया गया है।

भारती खेर, शिल्पा गुप्ता, जितिश कल्लाट, मिठू सेन और वी. रमेश जैसे समकालीन और जीवित भारतीय कलाकारों को भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ज़्यादा पहचान मिली है।

मनसुखानी ने कहा कि भले ही समकालीन और आधुनिक, दोनों तरह के कलाकारों ने अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में अपनी मौजूदगी बढ़ाई है, लेकिन उनके जुड़ने का तरीका अलग-अलग है।

भाषा वैभव नेत्रपाल

नेत्रपाल


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