योगेंद्र यादव ने ‘सभ्यतागत संघर्ष’ की चेतावनी दी, राजनीतिक भागीदारी जारी रखने की अपील
योगेंद्र यादव ने ‘सभ्यतागत संघर्ष’ की चेतावनी दी, राजनीतिक भागीदारी जारी रखने की अपील
नयी दिल्ली, पांच मई (भाषा) राजनीतिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव ने मंगलवार को पश्चिम बंगाल और असम के हालिया चुनाव परिणामों को केवल सत्ता के लिए होने वाला सामान्य मुकाबला नहीं, बल्कि देश में चल रहे एक व्यापक ‘सभ्यतागत संघर्ष’ का हिस्सा बताया।
दोनों ही राज्यों में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने बड़ी जीत हासिल की है।
रफरफ शकील अंसारी और जावेद अनवर की हिंदी पुस्तक ‘जाति और सांप्रदायिकता के विषाणु’ के विमोचन के अवसर पर यादव ने कहा कि आज की राजनीति केवल सीटें जीतने या व्यक्तियों को आगे बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि उस पर कहीं अधिक बड़ी जिम्मेदारी है।
उन्होंने चुनाव परिणामों को टी20 क्रिकेट के स्कोर की तरह पेश किए जाने की आलोचना भी की।
उन्होंने कहा, ‘‘यह न तो क्रिकेट का खेल है और न ही केवल चुनावी परिणाम। अब यह सिर्फ राजनीतिक मुकाबला नहीं, बल्कि सभ्यतागत संघर्ष बन चुका है।’’
यादव ने यह भी कहा, ‘‘ दांव पर केवल ममता बनर्जी या हिमंत विश्व शर्मा का पद नहीं है, बल्कि देश का इतिहास ही खतरे में है।’’ साथ ही कहा कि अब मामला केवल राजनीतिक सत्ता से कहीं आगे बढ़ चुका है।
भाजपा ने पश्चिम बंगाल में 294-सदस्यीय विधानसभा की 207 सीट जीतकर भारी जीत दर्ज की और इसके साथ ही तृणमूल कांग्रेस के 15 साल के शासन का अंत हो गया।
असम में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) ने 126-सदस्यीय विधानसभा में 102 सीट जीतकर लगातार तीसरी बार सरकार बनाने का मार्ग प्रशस्त किया।
यादव ने आरोप लगाया कि मौजूदा राजनीतिक दिशा देश के बुनियादी सिद्धांतों पर हमला है।
उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और भाजपा पर देश की दीर्घकालिक “सभ्यतागत भावना” पर प्रहार करने का भी आरोप लगाया।
उन्होंने कहा, ‘‘आरएसएस और भाजपा का हमला सिर्फ कांग्रेस या विपक्ष पर नहीं है। यह इस देश की नींव पर हमला है। यह इस देश के ‘स्वधर्म’ पर हमला है, इस धरती की बुनियादी नींव पर हमला है।’’
पश्चिम बंगाल या असम के चुनाव परिणामों से निराश लोगों के परिप्रेक्ष्य में 62-वर्षीय यादव ने लोगों से राजनीति से दूरी न बनाने की अपील की और चेतावनी दी कि ऐसा करने से मैदान “विभाजनकारी ताकतों” के लिए खाली हो जाएगा।
उन्होंने कहा कि राजनीतिक भागीदारी केवल चुनाव लड़ने या किसी पार्टी में शामिल होने तक सीमित नहीं है।
उन्होंने कहा, “संघर्ष, विचार, संस्कृति और रचनात्मक कार्य के माध्यम से जुड़ने के कई तरीके हैं, लेकिन राजनीति से मुंह मोड़ लेना विकल्प नहीं है।”
यादव ने गहन बौद्धिक सहभागिता के महत्व पर भी जोर दिया और कहा कि इतिहास बताता है कि संकट के समय अक्सर शक्तिशाली और परिवर्तनकारी विचार जन्म लेते हैं।
राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित ‘जाति और सांप्रदायिकता के विषाणु’ पुस्तक इस बात की पड़ताल करती है कि भारत में प्रचलित रोजमर्रा की कहावतें और मुहावरे अक्सर जातिगत भेदभाव और सांप्रदायिक पूर्वाग्रह को कैसे व्यक्त करते हैं और उन्हें मजबूत भी करते हैं।
इस पुस्तक के विमोचन समारोह में वरिष्ठ पत्रकार आशुतोष, समाजवादी पार्टी के नेता राजकुमार भाटी और लेखक-विद्वान हिलाल अहमद उपस्थित थे।
भाषा सुरेश पवनेश
पवनेश

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