अगर रिव्यू देखकर दर्शक थिएटर जाते तो इतिहास न बनाती शोले
अगर रिव्यू देखकर दर्शक थिएटर जाते तो इतिहास न बनाती शोले
हर शुक्रवार को सिल्वर स्क्रीन नई फिल्म दस्तक देती है. फिल्म को लेकर समीक्षक अपने –अपने हिसाब से रिव्यू देते हैं. कई बार तो समीक्षकों का रिव्यू बहुत कड़ा होता है. इस तरह के रिव्यू देखने के बाद आप अगर फिल्म देखने का मन बना चुके हों तो भी कैंसिल करना पड़ता है. कई बार समीक्षकों की राय सही साबित होती है लेकिन फिल्म समीक्षकों का रिव्यू हर बार सही हो ये जरुरी नहीं होता.
A critic’s Review of SHOLAY in a newspaper in 1975 :
An average film.@SrBachchan name not mentioned even once.Is referred to as Dharam’s buddy.Nazir Hussain could have done better than Sanjeev Kumar.
Amjad Khan banished & mauled completely by the critic.Jai Ho.:) pic.twitter.com/g6w8vAFcBm— Anupam Kher (@AnupamPkher) November 22, 2017
दरसअल, एक्टर अनुपम खेर ने ट्विटर पर एक बहुत पुराने अखबार की तस्वीर साझा की है जिसमें फिल्म ‘शोले’ का यह रिव्यू छपा है. इस रिव्यू में लिखा गया है कि फिल्म ‘शोले’ सलीम-जावेद की हर दूसरी फिल्म की तरह हत्याओं और बदले की कहानी है।

ये भी पढ़ें- सेल्फी को लेकर वरुण धवन को मुंबई पुलिस का ई-चालान
जब यह फिल्म रिलीज हुई थी, फिल्म समीक्षकों ने इसकी जमकर बुराई की थी. कहा गया था कि इस फिल्म में कानून को बहुत बेबस दिखाया गया है. साथ ही इस फिल्म को ‘जुर्म का महिमामंडन करने वाली फिल्म’ बताया गया था. कुछ क्रिटिक्स ने इसे साल 1971 में आई फिल्म ‘मेरा गांव मेरा देश’ की घटिया कॉपी भी बताया था. आज एक क्लासिक बन चुकी फिल्म ‘शोले’ को ‘हिंसक, बचकानी और औसत दर्जे की फिल्म’ करार दिया गया था.

1975 में रिलीज हुई ‘शोले’ को लेकर फिल्म समीक्षकों का रिव्यू देखने शायद ही किसी ने उम्मीद की हो कि ये फिल्म इतिहास लिखने जा रहे है। एक ऐसी फिल्म बनाने जा रहे हैं जिसे क्लासिक माना जाएगा या भारतीय फिल्म जगत में ये फिल्म हमेशा यादगार रहेगी.
वेब डेस्क, IBC24

Facebook


