शह मात The Big Debate: 4 बार माफी..नहीं है काफी! कर्नल सोफिया केस से निकल पाएंगे विजय शाह?
Colonel Sophia Qureshi case: 4 बार माफी..नहीं है काफी! कर्नल सोफिया केस से निकल पाएंगे विजय शाह?
Colonel Sophia Qureshi case | Photo Credit: IBC24
- सुप्रीम कोर्ट में 9 फरवरी को कर्नल सोफिया मामले की सुनवाई होगी
- मंत्री विजय शाह ने चौथी बार माफी मांगी
- लेकिन कोर्ट ने साफ कहा कि यह माफी योग्य मामला नहीं है
भोपाल: Minister Vijay Shah कर्नल सोफिया मामले में 9 फरवरी यानि सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होनी है, इससे पहले मंत्री विजय शाह ने एक बार फिर माफी मांगी है। इंदौर में मीडिया को बयान देते हुए विजय शाह ने कहा कि मैंने पहले भी कई बार कहा है, और आज फिर दोहरा रहा हूं कि मेरा कोई उद्देश्य नहीं था की किसी महिला अधिकारी, भारतीय सेना और समाज किसी वर्ग का अपमान हो, लेकिन बड़ा सवाल है कि जब कोर्ट में मामला है तो माफी से मिलेगा क्या?
Colonel Sophia Qureshi case एमपी सरकार के मंत्री विजय शाह ने 11 मई से अब तक चार बार ऑपरेशन सिन्दूर की नायिका कर्नल सोफ़िया कुरैशी मामले में माफ़ी मांग ली है। ये मामला हाईकोर्ट होता हुआ सुप्रीम कोर्ट पहुँचा था और सबसे बड़ी अदालत ने एमपी सरकार को निर्देश दिया है कि ये माफ़ी लायक़ मामला नहीं है। 9 फरवरी से पहले मंत्री के खिलाफ़ मुकदमा दर्ज़ करिए और कोर्ट को बताइये कोर्ट की मियाद ख़त्म होने में जब 48 घंटे बचे तब फिर शाह ने माफ़ी मांगी। इधर भाजपा पशोपेश में है समझ रही है कि इस पर कुछ ज्यादा बोलना यानि तलवार की धार में चलने जैसा फिसले और कटे। लिहाज़ा कोर्ट का फैसला मंज़ूर होगा से आगे भला बोल भी क्या सकती है।
इस मामले में मंत्री को घेरने में कांग्रेस की वैसी कोई भूमिका नहीं रही क्यूंकि सारा मसला बड़ा किया मीडिया ने और स्वतः संज्ञान लेकर कोर्ट ने इसमें कांग्रेस न तो वादी है। ना ही प्रतिवादी है सिर्फ तमाशाई लेकिन बतौर विपक्ष उसका वाज़िब हक़ बनता है मंत्री के इस्तीफ़े की मांग करके कोर्ट से बाहर भी माहौल गरमाए रखना। उसको ये माफ़ी भी रास नहीं आई उसे इंतज़ार कानूनी डंडे का है।
वैसे अचानक आई मंत्री विजय शाह की माफ़ी के मायने कोर्ट के सामने तो कुछ नहीं है। लेकिन सरकार यदि 9 तारीख की मियाद को आगे बढ़ाने की गुहार लगाए तो ये माफ़ी सुलभ सन्दर्भ शायद बन जाए। ऐसे में सवाल उठता है कि पहले हाई कोर्ट फिर सुप्रीम कोर्ट के तल्ख़ निर्देशों को क़ानूनी प्रावधानों के तहत टाला क्यूँ जा रहा है? क्या अपने आदिवासी मंत्री को बचाने में सरकार लगी है? बड़ा सवाल ये भी जिस आदिवासी वोट बैंक के कारण शाह को बचाने की कवायद हो रही है,क्या वे आदिवासियों के सर्वमान्य नेता हैं भी या नहीं?
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