लता मंगेशकर को ताउम्र याद आते रहे इंदौर की सर्राफा चौपाटी के चटपटे जायके

लता मंगेशकर को ताउम्र याद आते रहे इंदौर की सर्राफा चौपाटी के चटपटे जायके

Modified Date: February 6, 2022 / 08:06 pm IST
Published Date: February 6, 2022 8:06 pm IST

इंदौर (मध्यप्रदेश), छह फरवरी (भाषा) इंदौर की मशहूर सर्राफा चौपाटी के चटपटे जायके लता मंगेशकर की यादों में ताउम्र बसे रहे और सुरों की मलिका अपनी जन्मस्थली की बात निकलते ही इस जगह का जिक्र छेड़ देती थीं।

इंदौर में 28 सितंबर 1929 को जन्मीं लता मंगेशकर का मुंबई के एक अस्पताल में रविवार को 92 साल की उम्र में निधन हो गया।

लता मंगेशकर के देहांत के बाद उनका एक पुराना वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। इसमें वह यादों की गली में कदम रखते हुए कहती सुनाई पड़ रही हैं,‘‘मैं सर्राफा चौपाटी जाकर दही बड़े और दूसरे व्यंजन बड़े चाव से खाया करती थी। ऐसा करना मुझे बहुत अच्छा लगता था। इंदौर कमाल की जगह है।’’

गौरतलब है कि शहर की सर्राफा चौपाटी में जायकों की दुनिया रात को आबाद होती है, जब सर्राफा बाजार में जेवरात की दुकानें बंद हो जाती हैं। रात के वक्त इन्हीं बंद दुकानों के बाहर व्यंजनों की दुकानें लग जाती हैं।

इस बीच, मंगेशकर के निधन पर उनकी स्थानीय रिश्तेदार कविता प्रगट ने शोक जताया। कविता ने संवाददाताओं को बताया कि इंदौर के सिख मोहल्ले में मंगेशकर के जन्म के बाद उनका परिवार महाराष्ट्र के सांगली चला गया था और इसके कुछ समय बाद इंदौर लौटकर मध्यप्रदेश के इस शहर के छावनी इलाके में रहा था।

प्रगट के मुताबिक बरसों पहले इंदौर में अपने एक कार्यक्रम के दौरान लोगों के हुड़दंग पर मंगेशकर इस कदर नाराज हो गई थीं कि उन्होंने दोबारा जन्मस्थली में गायन की सार्वजनिक प्रस्तुति नहीं दी थी।

भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव तथा इंदौर के पूर्व महापौर कैलाश विजयवर्गीय ने एक वीडियो जारी किया और इसमें मंगेशकर को श्रद्धांजलि देते हुए कहा,‘‘हम लोग उनके निधन पर बेहद दु:खी हैं क्योंकि वह इंदौर की बेटी थीं।’’

उन्होंने कहा,‘‘महापौर पद पर रहने के दौरान मैंने मंगेशकर से मिलकर इंदौर आने का अनुरोध किया था। पर किसी एक घटना के कारण वह इंदौर आने के लिए तैयार नहीं थीं। हम दु:खी हैं कि वह इंदौर की बेटी होने के बावजूद भी अपने अंतिम समय में इंदौर नहीं आईं और हम उनका स्वागत नहीं कर सके।’’

हालांकि, विजयवर्गीय ने वीडियो में उस कथित घटना का ब्योरा नहीं दिया जिसके कारण मंगेशकर ने उनके जीवन के आखिरी सालों में अपनी जन्मस्थली इंदौर की यात्रा से परहेज किया।

भाषा हर्ष

रंजन

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