मप्र में ‘जंगल के राजा’ को मिला नया आशियाना जहां ‘मुसाफिर’ से ‘बाशिंदे’ बने बाघ
मप्र में ‘जंगल के राजा’ को मिला नया आशियाना जहां ‘मुसाफिर’ से ‘बाशिंदे’ बने बाघ
(हर्षवर्धन प्रकाश)
इंदौर, 27 अप्रैल (भाषा) मध्यप्रदेश में ‘जंगल के राजा’ बाघ को खिवनी वन्यजीव अभयारण्य के रूप में नया घर मिल गया है।
वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार, बाघ पहले इस अभयारण्य को गलियारे के तौर पर इस्तेमाल करते हुए किसी ‘मुसाफिर’ की तरह गुजर जाते थे, लेकिन संरक्षण के प्रयासों की सफलता के कारण अब वे इसमें बसकर अपना कुनबा बढ़ाने लगे हैं।
खिवनी वन्य जीव अभयारण्य के अधीक्षक विकास माहोरे ने सोमवार को ‘पीटीआई-भाषा’ को बताया कि हाल के दिनों में अभयारण्य में करीब 10 वयस्क बाघ-बाघिनों और पांच से छह शावकों की मौजूदगी के सुराग मिले हैं।
माहोरे ने बताया, “कुछ साल पहले खिवनी अभयारण्य में बाघ मुश्किल से दिखते थे। कभी-कभार एक-दो बाघ नजर आ जाते थे, लेकिन अब बेहतर संरक्षण और सुरक्षित आवास मिलने के कारण बाघों की तादाद बढ़ी है।’
देवास जिले में वर्ष 1982 के दौरान खिवनी वन्यजीव अभयारण्य की स्थापना की गई थी। बाद में अभयारण्य का विस्तार करके सीहोर जिले के वन क्षेत्रों को भी इसमें शामिल किया गया था।
शुष्क पर्णपाती वनों में लगभग 135 वर्ग किलोमीटर में फैला अभयारण्य ओंकारेश्वर के जंगलों और रातापानी अभयारण्य के बीच के उस गलियारे का हिस्सा है जो बाघों की आवा-जाही का अहम मार्ग माना जाता है। यह रास्ता पश्चिमी मध्यप्रदेश और विंध्य पर्वतमाला के जंगलों को जोड़ता है।
अधीक्षक माहोरे ने बताया कि गुजरे सालों के दौरान वन विभाग के प्रयासों से खिवनी अभयारण्य में बाघों के लिए अनुकूल परिस्थितियां विकसित हुई हैं जिनमें चीतल, सांभर और नीलगाय जैसे वन्यजीवों के रूप में पर्याप्त शिकार आधार शामिल है।
उन्होंने बताया कि अभयारण्य में बसे ग्रामीणों के पुनर्वास से इस क्षेत्र को ‘कम मानवीय दखल’ वाला बनाए जाने के कारण इसमें बाघों के लिए सुरक्षित माहौल तैयार हुआ है।
माहोरे ने बताया कि राज्य सरकार ने अभयारण्य को आदर्श पारिस्थितिकी पर्यटन मॉडल के रूप में विकसित करने की दिशा में पहल तेज की है जिसमें स्थानीय समुदाय की भागीदारी पर विशेष जोर दिया जा रहा है।
माहोरे ने कहा, “हमारा लक्ष्य है कि खिवनी की अर्थव्यवस्था स्थानीय समुदाय के माध्यम से ही संचालित हो। इसलिए स्थानीय लोगों को पर्यटन गतिविधियों से जोड़ने की पहल भी की गई है। बाघ सफारी, गाइड और अन्य सेवाओं में स्थानीय युवाओं को शामिल किया गया है। इससे बाघ संरक्षण के प्रति जागरूकता के साथ ही रोजगार के अवसर भी बढ़े हैं।’’
पर्यटकों के बीच खिवनी अभयारण्य के बाघ ‘युवराज’ और बाघिन ’मीरा’ की जोड़ी और उनके शावक खासे मशहूर हैं।
गर्मी बढ़ने के बीच इन दिनों बाघों का यह परिवार अभयारण्य के जल स्रोतों पर अपनी प्यास बुझाते देखा जा रहा है और इसके वीडियो सोशल मीडिया पर लोगों का ध्यान खींच रहे हैं।
वन्यजीव विशेषज्ञ अजय गड़ीकर ने कहा, ‘‘खिवनी अभयारण्य करीब 15 साल पहले पेड़ों की अवैध कटाई के लिए कुख्यात था। इस पर अंकुश लगाए जाने और वन्य जीव संरक्षण बढ़ाए जाने से अभयारण्य बाघों के नये ठिकाने के रूप में उभरा है।’’
उन्होंने कहा कि अभयारण्य का नया स्वरूप सूबे में बाघ संरक्षण के विकेंद्रीकृत मॉडल को मजबूती देता है जिससे पारंपरिक बाघ अभयारण्यों के बाहर भी ‘जंगल के राजा’ के लिए सुरक्षित बसाहट विकसित हो रही है।
अभयारण्य में बाघों की बढ़ती तादाद के मद्देनजर मुख्यमंत्री मोहन यादव ने हाल ही में घोषणा की है कि इसे वन्यजीव संरक्षण और पारिस्थितिकी पर्यटन के आदर्श केंद्र के रूप में विकसित किया जाएगा।
भाषा हर्ष मनीषा
मनीषा

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