भोजशाला को ‘मस्जिद घोषित करने’ के रियासतकालीन आदेश की कोई कानूनी मान्यता नहीं : मध्यप्रदेश सरकार

भोजशाला को ‘मस्जिद घोषित करने’ के रियासतकालीन आदेश की कोई कानूनी मान्यता नहीं : मध्यप्रदेश सरकार

भोजशाला को ‘मस्जिद घोषित करने’ के रियासतकालीन आदेश की कोई कानूनी मान्यता नहीं : मध्यप्रदेश सरकार
Modified Date: May 7, 2026 / 08:53 pm IST
Published Date: May 7, 2026 8:53 pm IST

इंदौर, सात मई (भाषा) मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय में भोजशाला मंदिर-कमाल मौला मस्जिद विवाद के मामले की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने बृहस्पतिवार को दलील दी कि इस स्मारक को लेकर तत्कालीन धार रियासत के दरबार की ओर से वर्ष 1935 में जारी ‘ऐलान’ (सरकारी आदेश) की कोई कानूनी मान्यता नहीं है।

मुस्लिम पक्ष ने 91 साल पुराने रियासतकालीन आदेश के हवाले से दावा किया है कि इसके जरिये भोजशाला को मस्जिद घोषित किया गया था और इसमें नमाज जारी रखे जाने की अनुमति दी गई थी।

भोजशाला को हिंदू समुदाय वाग्देवी (देवी सरस्वती) का मंदिर मानता है, जबकि मुस्लिम पक्ष इस स्मारक को कमाल मौला मस्जिद बताता है। यह विवादित परिसर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा संरक्षित है।

प्रदेश के महाधिवक्ता प्रशांत सिंह ने तत्कालीन धार रियासत के दीवान और प्रशासनिक परिषद के अध्यक्ष के. नाडकर के 24 अगस्त 1935 को जारी ‘ऐलान’ की कानूनी वैधता को चुनौती दी।

उन्होंने इंदौर पीठ के न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला और न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी के सामने तर्क रखा कि यह रियासतकालीन आदेश विधायी प्रक्रिया के तहत जारी नहीं किया गया था, इसलिए इसे कानून नहीं माना जा सकता।

सिंह ने कहा कि पूर्व धार रियासत का ‘ऐलान’ एक वर्ग के संविधानप्रदत्त अधिकारों का हनन है और इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता।

उन्होंने इस रियासतकालीन आदेश की पृष्ठभूमि पर जोर देते हुए धार दरबार की कार्यवाही का विस्तृत विवरण पेश किया और कहा कि विवादित स्मारक के नामकरण के विवाद के कारण इस शहर में कानून-व्यवस्था खराब होने की आशंका के बाद इसे जारी किया गया था।

सिंह ने कार्यवाही के हवाले से कहा कि विवादित स्मारक को ऐतिहासिक तौर पर भोजशाला के नाम से जाना जाता रहा है, लेकिन मुस्लिम समुदाय के लोगों ने तत्कालीन धार रियासत को पहले अर्जी दी कि स्मारक के बाहर लगे बोर्ड में भोजशाला के साथ ‘कमाल मौला मस्जिद’ शब्द जोड़ा जाए और बाद में कहा कि बोर्ड से भोजशाला का नाम हटा दिया जाए।

महाधिवक्ता के मुताबिक प्रशासनिक परिषद के अध्यक्ष नाडकर ने कार्यवाही में लिखा था कि इस ‘अनुचित मांग’ पर विचार संभव नहीं है क्योंकि परंपराओं और इतिहास के आधार पर स्मारक को काफी लंबे समय से भोजशाला के नाम से जाना जाता रहा है।

सिंह ने विवादित परिसर में एएसआई के वैज्ञानिक सर्वेक्षण की रिपोर्ट के कई अंश पढ़े। इनमें परिसर में हिंदू देवी-देवताओं से संबंधित मूर्तिकला के अवशेष मिलने और वहां धार के परमार राजाओं के शासनकाल की एक विशाल संरचना पहले से मौजूद होने का ब्योरा शामिल है।

महाधिवक्ता ने अयोध्या के राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद के मुकदमे में शीर्ष अदालत के फैसले का उल्लेख भी किया और उच्च न्यायालय से अनुरोध किया कि इस निर्णय से स्थापित न्यायिक सिद्धांतों के आधार पर भोजशाला मामले के तथ्यों की छानबीन की जानी चाहिए।

एएसआई के 2003 के एक आदेश के तहत विवादित स्मारक में हर मंगलवार को हिंदुओं और हर शुक्रवार को मुस्लिमों को उपासना की अनुमति दी गई है।

सिंह ने इसे ‘अस्थायी व्यवस्था’ करार देते हुए कहा कि भोजशाला विवाद का स्थायी हल निकाला जाना चाहिए।

उन्होंने इस विवाद के कारण गुजरे बरसों के दौरान धार में सांप्रदायिक तनाव और हिंसा की घटनाओं का विवरण भी दिया।

मामले पर शुक्रवार को भी सुनवाई जारी रहेगी।

उच्च न्यायालय भोजशाला मंदिर-कमाल मौला मस्जिद परिसर के धार्मिक स्वरूप को लेकर दायर पांच याचिकाओं और एक रिट अपील पर छह अप्रैल से नियमित सुनवाई कर रहा है।

भाषा हर्ष

जोहेब

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