खिलजी के हमले के दौरान भोजशाला में मंदिर तोड़े जाने का सबूत नहीं: मुस्लिम पक्ष
खिलजी के हमले के दौरान भोजशाला में मंदिर तोड़े जाने का सबूत नहीं: मुस्लिम पक्ष
इंदौर, 30 अप्रैल (भाषा) मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय में बृहस्पतिवार को मुस्लिम पक्ष ने दलील दी कि धार के विवादित भोजशाला परिसर में सरस्वती मंदिर होने और अलाउद्दीन खिलजी की फौज के हमले में इसे ध्वस्त करके मस्जिद में तब्दील किए जाने का कोई भी दस्तावेजी सबूत नहीं है।
भोजशाला को हिंदू समुदाय वाग्देवी (देवी सरस्वती) का मंदिर मानता है, जबकि मुस्लिम पक्ष इस स्मारक को कमाल मौला मस्जिद बताता है। यह विवादित परिसर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा संरक्षित है।
याचिकाकर्ताओं में शामिल संगठन ‘हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस’ ने उच्च न्यायालय में दावा किया है कि भोजशाला मूलत: परमार राजवंश के राजा भोज द्वारा वर्ष 1034 में स्थापित सरस्वती मंदिर है जिसे मालवा क्षेत्र पर अलाउद्दीन खिलजी की फौज के आक्रमण के दौरान खिलजी के हुक्म पर 1305 में ढहाया गया था।
संगठन ने यह दावा भी किया है कि विवादित परिसर में मस्जिद बनाने के लिए मंदिर के अवशेषों का पुनः उपयोग किया गया था।
सुनवाई के दौरान धार की मौलाना कमालुद्दीन वेलफेयर सोसाइटी के वकील तौसीफ वारसी ने इंदौर पीठ के न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला और न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी के समक्ष विस्तृत दलीलें पेश कीं।
वारसी ने विभिन्न इतिहासकारों और अभिलेखीय स्रोतों का हवाला देते हुए तर्क दिया कि 14वीं सदी की शुरुआत में अलाउद्दीन खिलजी की फौज के हमले के दौरान धार में किसी सरस्वती मंदिर को तोड़े जाने का कोई भी दस्तावेजी सबूत मौजूद नहीं है।
मुस्लिम पक्ष के वकील ने वी.डी. महाजन, आर.सी. मजूमदार और अन्य देशी-विदेशी इतिहासकारों की पुस्तकों व प्रकाशनों का हवाला देते हुए कहा कि खिलजी की फौज द्वारा 1305 के दौरान मालवा में जीत हासिल करना इतिहास में दर्ज है, लेकिन इनमें से कोई भी स्रोत इस सैन्य अभियान के दौरान किसी मंदिर को तोड़े जाने या किसी इमारत को मस्जिद में बदले जाने का उल्लेख नहीं करता।
इतिहासकारों के अनुसार 1305 में मालवा पर आक्रमण का नेतृत्व खिलजी के सेनापति और प्रशासक ऐन-उल-मुल्क मुल्तानी ने किया था।
वारसी ने 2003 में ब्रिटिश उच्चायोग की ओर से मध्यप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री को भेजे कथित पत्र का हवाला दिया और दावा किया कि लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम में रखी जिस मूर्ति को हिंदू पक्ष के याचिकाकर्ता भोजशाला की वाग्देवी (देवी सरस्वती) की प्रतिमा बता रहे हैं, वह असल में जैन समुदाय की देवी अम्बिका की मूर्ति है।
उन्होंने एएसआई की कार्यप्रणाली को कटघरे में खड़ा करते हुए यह भी कहा कि संस्कृति मंत्रालय के तहत काम करने वाले इस विभाग ने भोजशाला की धार्मिक प्रकृति को लेकर अलग-अलग मामलों में अलग-अलग जवाब दिए हैं।
वारसी के अनुसार मौलाना कमालुद्दीन वेलफेयर सोसाइटी की 2019 में दायर जनहित याचिका पर एएसआई का जवाब, ‘हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस’ और कुलदीप तिवारी की 2022 में अलग-अलग पेश दो जनहित याचिकाओं पर दिए गए उत्तरों से अलग है।
उच्च न्यायालय ने मामले में अगली सुनवाई के लिए चार मई की तारीख तय की है। इस दिन मौलाना कमालुद्दीन वेलफेयर सोसाइटी की ओर से भोजशाला परिसर में एएसआई की वीडियोग्राफी के संबंध में तर्क प्रस्तुत किए जाएंगे।
उच्च न्यायालय इस स्मारक के धार्मिक स्वरूप को लेकर दायर चार याचिकाओं और एक रिट अपील पर छह अप्रैल से नियमित सुनवाई कर रहा है।
भाषा हर्ष शोभना
शोभना

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