भोपाल, 28 मई (भाषा) ”उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो, न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए” जैसे शेर लिखने वाले पद्मश्री से सम्मानित उर्दू शायर बशीर बद्र का लंबी बीमारी के बाद बृहस्पतिवार को भोपाल में निधन हो गया। परिवार के सूत्रों ने यह जानकारी दी।
वह 91 वर्ष के थे और पिछले कुछ समय से बीमार थे।
परिवार के एक सदस्य ने बताया कि दिग्गज कवि ने भोपाल में अपने घर पर अंतिम सांस ली।
वर्ष 1972 में भारत और पाकिस्तान के बीच शिमला समझौते के दौरान, बद्र ने ‘दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे, जब कभी हम दोस्त हो जाएं तो शर्मिंदा ना हों’ जैसी कालजई पंक्तियां लिखी थीं।
उनके अन्य प्रसिद्ध शेरों में ”कुछ तो मजबूरियां रही होंगी, यूं ही कोई बेवफा नहीं होता”, ”उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो, ना जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए” और ”लोग टूट जाते हैं एक मकां बनाने में, वो तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में” शामिल हैं।
जाने-माने गीतकार जावेद अख्तर ने बद्र के निधन पर शोक व्यक्त किया है।
अख्तर ने ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में कहा, ‘आज हमारी भाषा उर्दू और गरीब हो गई है। बशीर बद्र, एक अत्यंत मधुर कवि, हमारे बीच से हमेशा के लिए विदा हो गए हैं। उनकी गज़लें और उनकी शायरी हमेशा हमारी यादों में जीवित रहेगी।’
मीर तकी मीर की गजलों की तरह बद्र की गजलों में भी अत्यधिक समकालीन उर्दू थी लेकिन उसे आसानी से समझा जा सकता था इसलिए लोग इसे सराहते भी थे। उनकी कुछ उत्कृष्ट कृतियों ने व्यथित प्रेम की अभिव्यक्ति के रूप में काम किया और जीवन के रहस्यों को भी व्यक्त किया।
उत्तर प्रदेश के अयोध्या में 15 फरवरी 1935 को जन्मे बद्र ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में उर्दू के शिक्षक के तौर पर काम किया। वह भाषा पर अपनी पकड़, खासकर गजलों में महारत के लिए विख्यात थे। वह फारसी, हिंदी और अंग्रेजी के भी जानकार थे। उनका असल नाम सय्यद मुहम्मद बशीर था।
बद्र की 69 गजलों का संग्रह ‘आस’ को उनकी चर्चित कृतियों में गिना जाता है। उनका एक अन्य संग्रह, जिसका शीर्षक ‘कुल्लियते बशीर बद्र’ है, पाकिस्तान में प्रकाशित हो चुका है।
ऐसा माना जाता है कि उन्होंने सात साल की कम उम्र में कविता लिखना शुरू कर दिया था। बद्र साहब को समर्पित एक वेबसाइट के मुताबिक वह अपने कई गीतों में उर्दू की कोमलता को अंग्रेजी उच्चारण में घोल देने में अग्रणी थे।
जानकारों के मुताबिक बशीर बद्र की गजलों में शब्द व संवेदना की सतह पर ताजगी, काव्यात्मकता और सौंदर्य हुआ करते थे, जो उन्हें दूसरे शायरों से अलग करती थी।
उन्होंने उर्दू में सात से अधिक कविता संग्रह और हिंदी में एक कविता संग्रह प्रकाशित किया। उनके प्रमुख गजल संग्रहों में इकाई, इमेज, आमद, आस, आसमान और आहट शामिल हैं।
बद्र ने साहित्यिक आलोचना की दो किताबें भी लिखीं- ‘आज़ादी के बाद की गल का तन्क़ीदी मुताला’ और ‘बीसवीं सदी में उर्दू गजल’।
उन्होंने देवनागरी लिपि में उर्दू गजलों का एक संग्रह भी निकाला, जिसका शीर्षक ‘उजाले अपनी यादों के’ था। उनकी रचनाएं गुजराती में भी प्रकाशित हुई हैं और अंग्रेजी और फ्रेंच में अनुवादित की गई हैं।
पद्मश्री के अलावा बद्र को चार बार उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी और एक बार बिहार उर्दू अकादमी पुरस्कार ने सम्मानित किया गया है। उन्हें मीर अकादमी पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। इसके अलावा भी उन्होंने कई अन्य सम्मान हासिल किए।
बद्र की जीवन यात्रा आसान नहीं थी। अप्रैल 1987 में सांप्रदायिक हिंसा के दौरान मेरठ में उनका घर जला दिया गया था, जिससे उनकी अधिकांश अप्रकाशित रचनाएं नष्ट हो गई थीं। लेकिन उन्होंने नए सिरे से शुरुआत की और भोपाल चले गए।
वेबसाइट के अनुसार, इस घटना ने जीवन की अन्य चुनौतियों के साथ, उनके कई लेखों को एक मजबूत करुणा प्रदान की।
उनकी लोकप्रियता का आलम यह था कि उनके चाहने वाले उन्हें अमेरिका, दुबई, कतर और पाकिस्तान सहित दुनिया भर के विभिन्न मुल्कों में आमंत्रित किया करते थे।
बशीर बद्र के परिवार में उनकी पत्नी और दो बच्चे हैं।
एक रिश्तेदार ने बताया कि उनका अंतिम संस्कार शाम को किया जाएगा।
भाषा
ब्रजेन्द्र रवि कांत