देखिए परसवाड़ा विधानसभा सीट के विधायकजी का रिपोर्ट कार्ड
देखिए परसवाड़ा विधानसभा सीट के विधायकजी का रिपोर्ट कार्ड
बालाघाट। विधायकजी का रिपोर्ट कार्ड में आज हम बात कर रहे हैं मध्यप्रदेश की परसवाड़ा विधानसभा सीट की। बालाघाट जिले में आने वाले परसवाड़ा विधानसभा क्षेत्र में आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर की सरगर्मियां बढ़ने लगी हैं। बीजेपी-कांग्रेस अपने-अपने दावे कर रहीं हैं। लेकिन वोटर्स ने भी अपना मूड बना लिया है। जाहिर है कांग्रेस के मौजूदा विधायक की क्षेत्र में गैरमौजूदगी, बुनियादी विकास और चुनाव जीतने के पहले किए वादों पर परसवाड़ा के वोटर्स वोट करने के लिए तैयार नजर आ रहे हैं। हालांकि कांग्रेस विधायक का दावा है कि उनके काम की वजह से इस बार भी जनता उनपर भरोसा जताएगी।
परसवाड़ा से चुनाव लड़ने का सपना देखने वाले टिकट के दावेदारों को जनता की शिकायतें सुनने के लिए अपने आप को तैयार कर लेना चाहिए। यहां हर इलाके की अपनी समस्याएं हैं। खास तौर पर वनांचल इलाकों में बुनियादी विकास का नहीं होना कांग्रेस के मौजूदा विधायक मधु भगत को भारी पड़ सकता है। पिछले चुनाव में मधु भगत ने परसवाड़ा की जनता को विधायक निधि से निराश्रित पेशन के लिए 1 हजार और मुख्यमंत्री कन्यादान योजना के अलावा विधायक निधि से 5 हजार रुपए अलग से देने का वादा किया था, जो अब तक पूरा नहीं हुआ है। ऐसे में अधूरे वादों की फेहरिस्त लेकर विपक्ष आगामी चुनाव में कांग्रेस विधायक को घेरने की रणनीति बनाने में जुट गया है।
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इसके अलावा रजेगांव में बंद पड़े उद्योगों को दोबारा शुरु करने, पेपर मिल बनवाने और क्षेत्र में कॉलेज खोलने जैसे वादे भी मधु भगत के लिए बड़ी परेशानी का सबब बन सकते हैं। यानी चुनावी साल में वोटर्स की नाराज़गी दूर करना कांग्रेस विधायक मधु भगत के लिए बड़ी चुनौती है। हालांकि अपने ऊपर लगे आरोपों पर मधु भगत सफाई देते हुए कहते हैं कि क्षेत्र के 200 से भी ज्यादा निराश्रित महिलाओं को वो खुद की तरफ से पेंशन दे चुके हैं। साथ ही क्षेत्र की लड़कियों की शादी के लिए 11 हजार से 21 हज़ार रुपए तक देते रहे हैं। कांग्रेस विधायक मधु भगत का दावा है कि उनके कामों की वजह से इस बार भी वोटर्स उन्हें ही परसवाड़ा से चुनाव जीताएगी।
कुल मिलाकर चुनावी साल में बालाघाट की परसवाड़ा विधानसभा सीट पर सियासत पूरे उफान पर है। दावे-वादे आरोपों प्रत्यारोपों के बीच वोटर्स ही तय करेंगे कि वो अगले विधायक के तौर पर किसे मौका देने का मूड बना रहे हैं।
परसवाड़ा विधानसभा का चुनावी इतिहास बेहद दिलचस्प रहा है। परसवाड़ा में साल 1998 से लेकर अब तक हुए चार चुनावों में हर बार कोई नया चेहरा ही जीता है। परसवाड़ा विधानसभा में बीजेपी-कांग्रेस के अलावा गोंडवाना गणतंत्र पार्टी का भी मजबूत वोट बैंक है। लिहाज़ा 2003 में गोंगपा से दरबू सिंह उईके एक बार विधायक रहकर अपनी मौजूदगी दर्ज करवा चुके हैं। वहीं यहां जातिगत समीकरण भी चुनाव नतीजों को प्रभावित करते हैं।
बालाघाट जिले में आने वाली परसवाड़ा विधानसभा की सियासी तासीर को समझना इतना आसान नहीं है। 1956 से अब तक हुए 14 विधानसभा चुनावों के नतीजों पर गौर करें तो यहां के सियासी समीकरण बड़े उलझे हुए नजर आते हैं। परसवाड़ा में किसी एक दल का कब्जा कभी नहीं रहा है। कभी जनता दल, तो कभी सपा, तो कभी बीजेपी, तो कभी कांग्रेस की जीत हुई है। इतना ही नहीं यहां की जनता ने निर्दलीय प्रत्याशी को भी मौका दिया है।
कांग्रेस के तेजलाल टेमरे और निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर चुनाव जीतने वाले कंकर मुंजारे के नाम सबसे ज्यादा तीन बार चुनाव जीतने का रिकार्ड दर्ज है। वहीं सीट पर गोंडवाना गणतंत्र पार्टी का भी मजबूत वोट बैंक है, जो हर चुनाव में गोंगपा के प्रत्याशियों का साथ देता है।
वैसे परसवाड़ा के सियासी इतिहास की बात की जाए तो 2003 में गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के टिकट पर दरबू सिंह उईके ने कंकर मुजारे को हराकर चुनाव जीता। वहीं 2008 में बीजेपी के रामकिशोर कांवरे चुनाव जीते। इस चुनाव में निर्दलीय कंकर मुजारे दूसरे जबकि गोंगपा से दरबू सिंह उईके तीसरे स्थान पर रहे। लेकिन 2013 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के मधु भगत ने बीजेपी के रामकिशोर कांवरे को शिकस्त दी। इस चुनाव में कांग्रेस को जहां 49500 वोट मिले, वहीं बीजेपी को 47200 वोट मिले। इस तरह जीत का अंतर महज 2300 वोटों का रहा।
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परसवाड़ा विधानसभा के जातिगत समीकरण की बात करें तो यहां 60 हजार आदिवासी वोट यहां बड़ी सियासी ताकत है। इसके अलावा 44 हजार पवार मतदाता, 32 हजार लोधी, 28 हजार मरार और 36 हजार अन्य वोटर हैं, जो नेताओं की किस्मत तय करते हैं। कुल मिलाकर ये तय है कि 2018 में इस सीट पर सियासी घमासान भी जोरदार होगा। लिहाजा बीजेपी और कांग्रेस सहित सपा, गोंगपा और बीएसपी ने भी अपने दांव चलने शुरू कर दिए हैं।
बालाघाट जिले की परसवाड़ा विधानसभा सीट पर इस बार सियासी समीकरण बेहद दिलचस्प बन रहे हैं। साल 2008 और 2013 के चुनावों की तरह इस बार भी मुकाबले में कांग्रेस और बीजेपी के अलावा सपा, गोंगपा भी मैदान में होगी। हालांकि पिछला चुनाव जीतकर कांग्रेस परसवाड़ा में ज़रुर मजबूत हुई है। लेकिन सपा और गोंडवाना गणतंत्र पार्टी ने भी अपना जनाधार क्षेत्र में नहीं खोया है। ऐसे में इस बार भी परसवाड़ा में मुकाबला कांटे की टक्कर होना तय है।
परसवाड़ा में कांग्रेस विधायक मधु भगत को आगामी विधानसभा चुनाव में तीन तरफा चुनौती मिलना तय है। बीजेपी और सपा के अलावा गोंगपा के नेताओं ने अपनी चुनावी तैयारियां शुरू कर दी है। सपा की बात करें तो पूर्व विधायक कंकर मुंजारे, गोंगपा से दरबू सिंह उईके और बीजेपी के पूर्व विधायक रामकिशोर कांवरे ने जनता के बीच अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहे है। हालांकि क्षेत्र में अपना प्रभाव रखने वाले चारों ही पार्टियों में दावेदारी को लेकर ज्यादा खींचतान नजर नहीं आती। बीजेपी की अगर बात की जाए तो पिछला चुनाव हारे पूर्व विधायक रामकिशोर कांवरे इकलौते दावेदार नजर आते हैं। उन्हें भी उम्मीद है कि परसवाड़ा की जनता इस बार उनपर भरोसा जताएगी।
वहीं तीन बार निर्दलीय विधायक रहे कंकर मुंजारे एक बार फिर सपा की टिकट पर ताल ठोंकने के लिए तैयार हैं। उनके मुताबिक मौजूदा कांग्रेस विधायक और राज्य सरकार की नाकामियों की वजह से क्षेत्र का विकास धीमा है।
परसवाड़ा विधानसभा क्षेत्र में पिछले चार बार के चुनावों में नए चेहरों को मौका देकर परसवाड़ा के वोटर्स ने मौजूदा विधायकों के खिलाफ अपने गुस्से का इज़हार भी किया है। इस बार भी विपक्षी पार्टियों को उम्मीद है कि परसवाड़ा के वोटर्स कांग्रेस के मौजूदा विधायक मधु भगत के खिलाफ वोटिंग कर अपने ट्रेंड पर कायम रहेंगे, लेकिन कांग्रेस विधायक मधु भगत को पूरी उम्मीद है कि परसवाड़ा की जनता एक बार फिर उन्हें जिताएगी।
परसवाड़ा विधानसभा सीट पर हर बार चुनाव चौंकाने वाला रहा है। 2 लाख वोटर्स वाले इस सीट पर यहां कभी किसी पार्टी का दबदबा नहीं रहा है। साथ ही जातिगत समीकरण भी निर्णायक साबित हुए हैं। जाहिर है सभी पार्टियां अपने उम्मीदवार तय करते समय यहां के जाति समीकरणों का पूरा ध्यान रखेंगी और इस सियासी पैतंरे में यहां के कई अहम मुद्दे पीछे छूट सकते हैं।
वेब डेस्क, IBC24

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