प्राथमिकी रद्द होने के बाद उच्च न्यायालय ने रिकॉर्ड से व्यक्ति का नाम हटाने का निर्देश दिया

प्राथमिकी रद्द होने के बाद उच्च न्यायालय ने रिकॉर्ड से व्यक्ति का नाम हटाने का निर्देश दिया

प्राथमिकी रद्द होने के बाद उच्च न्यायालय ने रिकॉर्ड से व्यक्ति का नाम हटाने का निर्देश दिया
Modified Date: July 14, 2026 / 04:20 pm IST
Published Date: July 14, 2026 4:20 pm IST

मुंबई, 14 जुलाई (भाषा) मुंबई उच्च न्यायालय ने कहा है कि निजता के मौलिक अधिकार में ‘राइट टू बी फॉरगॉटन’ भी शामिल है, और अदालत की रजिस्ट्री को एक व्यक्ति का नाम और उससे जुड़ी जानकारी रिकॉर्ड से हटाने का निर्देश दिया, क्योंकि उसके खिलाफ दर्ज प्राथमिकी पहले ही रद्द की जा चुकी है।

‘राइट टू बी फॉरगॉटन’ (रिकॉर्ड हटाने का अधिकार) लोगों को डिजिटल प्लेटफॉर्म, ‘सर्च इंजन’ और सार्वजनिक रिकॉर्ड से अपने बारे में निजी जानकारी हटाने की मांग करने का अधिकार देता है, जब वह जानकारी अब प्रासंगिक नहीं रह गई हो, या फिर उससे उनकी निजता के अधिकार का उल्लंघन हो रहा हो।

उच्च न्यायालय की नागपुर खंडपीठ ने पिछले सप्ताह पारित आदेश में कहा कि जब किसी व्यक्ति के खिलाफ जारी कानूनी कार्यवाही समाप्त कर दी जाती है, तो उससे जुड़ी जानकारी को इंटरनेट पर बनाए रखने से कोई जनहित पूरा नहीं होता।

पीठ में न्यायमूर्ति उर्मिला जोशी फाल्के और न्यायमूर्ति निवेदिता मेहता शामिल हैं।

यह आदेश 37 वर्षीय एक व्यक्ति की याचिका पर पारित किया गया। उसने उच्च न्यायालय के ‘रजिस्ट्रार जनरल’ को निर्देश देने की मांग की थी कि अदालत की वेबसाइट पर उपलब्ध उसके मामले से जुड़े फैसलों और आदेशों की सार्वजनिक डिजिटल प्रतियों से उसका नाम और अन्य व्यक्तिगत जानकारी हटा दी जाए।

याचिका के अनुसार, वर्ष 2017 में नागपुर पुलिस ने उक्त व्यक्ति के खिलाफ मामला दर्ज किया था। बाद में दोनों पक्षों के बीच आपसी सहमति से विवाद सुलझ गया। इसके बाद, व्यक्ति ने उसी वर्ष उच्च न्यायालय में प्राथमिकी रद्द करने के लिये याचिका दायर की, जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया।

याचिकाकर्ता ने कहा कि आपराधिक आरोपों से पूरी तरह से मुक्त होने के बावजूद अदालत के आदेशों की असंपादित डिजिटल प्रतियां अब भी इंटरनेट पर उपलब्ध हैं। ये रिकॉर्ड नौकरी और शैक्षणिक पृष्ठभूमि की सामान्य जांच के दौरान सामने आ जाते हैं, जिससे उसके करियर पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है और उसे सामाजिक कलंक का भी सामना करना पड़ रहा है।

व्यक्ति ने उससे जुड़े रिकॉर्ड हटाने का अधिकार लागू करने की मांग की।

अदालत ने कहा कि सूचना तक पहुंच लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण पहलू है, लेकिन इसे जनता के सूचना के अधिकार और व्यक्ति की निजता के अधिकार के बीच संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता से अलग नहीं किया जा सकता।

पीठ ने कहा कि चूंकि याचिकाकर्ता और शिकायतकर्ता के बीच विवाद सौहार्दपूर्ण ढंग से सुलझ चुका है, इसलिए यह याचिका स्वीकार किए जाने योग्य है।

पीठ ने उच्च न्यायालय के रजिस्ट्री विभाग को निर्देश दिया कि वह अपने सभी रिकॉर्ड से याचिकाकर्ता का नाम हटा दे।

भाषा सुभाष दिलीप

दिलीप


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