मुंबई उच्च न्यायालय ने आय से अधिक संपत्ति मामले में तत्कालीन नगर निकाय प्रमुख के आदेश को रद्द किया
मुंबई उच्च न्यायालय ने आय से अधिक संपत्ति मामले में तत्कालीन नगर निकाय प्रमुख के आदेश को रद्द किया
पुणे, पांच अप्रैल (भाषा) मुंबई उच्च न्यायालय ने तत्कालीन पुणे महानगरपालिका आयुक्त के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें एक पूर्व नगर निकाय अधिकारी के खिलाफ खुली जांच की मंजूरी देने से इनकार कर दिया गया था।
अदालत के इस आदेश के बाद, लगभग 2,000 करोड़ रुपये की कथित तौर पर आय से अधिक संपत्ति की जांच का रास्ता साफ हो गया है।
न्यायमूर्ति ए.एस. गडकरी और न्यायमूर्ति रणजीतसिंह राजा भोंसले की खंडपीठ ने बृहस्पतिवार को तत्कालीन पुणे महानगरपालिका (पीएमसी) आयुक्त सौरभ राव द्वारा जारी किए गए 16 अप्रैल और 25 अप्रैल, 2019 के आदेश को रद्द कर दिया।
पीएमसी प्रमुख के रूप में, राव ने भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) को पूर्व नगर अभियंता प्रशांत वाघमारे के खिलाफ खुली जांच शुरू करने के लिए पूर्व स्वीकृति देने से इनकार कर दिया था जो 22 वर्षों से अधिक समय तक मुख्य नगर अभियंता के रूप में सेवा देने के बाद इस वर्ष की शुरुआत में सेवानिवृत्त हुए थे।
अदालत ने कहा कि सक्षम प्राधिकार ने आरोपों का समानांतर मूल्यांकन करके और यह निष्कर्ष निकालकर कि कोई मामला नहीं बनता, अपने अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन किया है जबकि उसे केवल यह जांच करनी चाहिए थी कि अनुमोदन देने के लिए प्रथम दृष्टया मामला बनता है या नहीं।
पीठ ने कहा कि 2016 में दायर शिकायत में आरोप लगाया गया था कि वाघमारे ने पीएमसी में रहते हुए आय के ज्ञात स्रोतों से कहीं अधिक लगभग 2,000 करोड़ रुपये की संपत्ति अर्जित की थी। शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया था कि संपत्ति का हस्तांतरण परिवार के सदस्यों और उनसे जुड़ी कई कंपनियों के माध्यम से किया गया था।
हालांकि, तत्कालीन नगर आयुक्त ने वाघमारे द्वारा प्रस्तुत स्पष्टीकरण और दस्तावेजों के आधार पर मंजूरी देने से इनकार कर दिया और कहा था कि आय से अधिक संपत्ति का कोई मामला नहीं बनता है। इसके चलते एसीबी की गोपनीय जांच बंद कर दी गई थी।
अदालत ने यह भी कहा कि भ्रष्टाचार राष्ट्र का शत्रु है और भ्रष्टाचार से ग्रसित लोक सेवक, चाहे वह कितने ही उच्च पद पर हो, का पता लगाना और उसे दंडित करना भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत एक आवश्यक दायित्व है।
अदालत ने कहा कि लोक सेवकों द्वारा किया गया भ्रष्टाचार न केवल समाज के नैतिक ताने-बाने को नष्ट करता है, बल्कि राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था और राष्ट्र हित के लिए भी हानिकारक है।
भाषा
सुभाष प्रशांत
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